आत्मा की आवाज़ – कमलेश्वर

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आत्मा की आवाज़ - कमलेश्वर

 

मैं अपना काम खत्म करके वापस घर आ गया था। घर में कोई परदा करने वाला तो नहीं था, पर बड़ी झिझक लग रही थी। गोपाल दूर के रिश्ते से बड़ा भाई होता है, पर मेरे लिए वह मित्र के रूप में अधिक निकट था। आंगन में चारपाई पड़ी थी, उसी पर बैठ गया। भाभी खामोश-सी चौके में बैठी थीं । चूल्हे की आग मंझा गई थी, उन्होंने सुलगते कोयले पर घी की कटोरी गर्म होने के लिए रखी थी। मैं पहली बार इस घर में आया था, संकुचित-सा बैठ गया। भाभी के पास इस तरह अकेले में बैठना भी अजीब लग रहा था और जाकर बैठक में चुपचाप बैठने पर संकोच लगता था क्योंकि पराया घर और भाभी से पहली मुलाकात। कदम एकदम नहीं उठ पा रहे थे।

शाम काफी झुक आई थी। लालटेन जलाकर भाभी फिर वहीं चूल्हे के पास आकर बैठ गईं। उस उमस और खामोशी के वातावरण में जी घबराने लगा। आंगन में बंधे तार पर पड़े कपड़ों की सलवटों में अंधेरा भरता जा रहा था और जलती लालटेन का पीला-पीला बीमार-सा थकन भरा प्रकाश! और उसके सामने पड़ने पाली वस्तुओं की फैली हुई लंबी-लंबी काली छायाएं, घुटन-सी महसूस करते हुए, बहुत झिझकते-झिझकते कई बार कोशिश करने के बाद, एक बार आवाज़ फूट ही पड़ी– क्या गोपाल भैया बहुत देर से आते हैं?

— अक्सर देर हो जाती है। -वैसे ही बैठे भाभी ने निर्लिप्त भाव से कह दिया।

मैं खामोश हो गया, अब और कोई प्रश्न भी नहीं था। निदान चौके की तरफ ताकता रहा। चौके की छत को टिकाए रखने वाले दोनों खंभों की चौड़ी काली-काली छायाएं फर्श पर पड़कर फिर भीतरी दीवार की कालिख में गुम हो गई थीं और उनके बीच में दबी-सकुची-सी भाभी बैठी थीं…। मैं उकताकर उठना ही चाहता था कि भाभी बोलीं– आप खा लीजिए, भूख लग रही होगी।

— नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है, अब शायद आते ही होंगे। हमसे कहा था कि छह बजे तक जरूर आ जाएंगे। बहुत संभलते हुए घरेलू तरीके से मैंने कहा।

…चौके का धुआँ अब तक साफ हो चुका था पर घर के और हिस्सों से अधिक कालिख उसमें फैल चुकी थी। मैं गौर से भाभी को ताक रहा था क्योंकि यह तय था कि उनकी नज़रें मेरी ओर नहीं उठेंगी।

एक काला-काला-सा भारीपन वहाँ की वायु में भर रहा था, कोई आवाज़ नहीं, ठहरा-ठहरा-सा सब कुछ निस्पंद… भाभी जैसे इस ठहराव को जीवन में डालकर अभ्यासी बन चुकी थीं। अभी शादी को साल भर से अधिक नहीं हुआ होगा, लेकिन यह गतिहीन ठहराव जैसे जीवन की हर रंगीनी को मिटा चुका है।

घी कड़क उठा, भाभी ने उंगलियों से पकड़कर हटा दिया, कुछ इतनी आसानी से कि जैसे गर्म धातु जरा भी असर नहीं करती, न उंगली थरथराई, न कलाई ने जल्दी की। धुआँ छोड़ती हुई ठिंगरी भी अब तक बिलकुल चुप हो गई थी… काफी देर बाद वह ऊबती हुई कुछ कहने जा रही थीं कि गोपाल आ गया। मुझे देखते ही वह बोल पड़ा-

काफी अकेलापन महसूस किया होगा, क्या बताऊँ देर हो गई।

मैं खामोश रहा। वह कमीज उतारते हुए कहने लगा– इन्हें तो बस रोटी-गृहस्थी से काम है। अगर कनस्तर, डिब्बे और शीशियाँ जरा भी बुदबुदाना जानतीं होतीं तो शायद हमसे भी बात करने की नौबत न आती, तब भला तुमसे क्या की होंगी।

— हाँ, भाभी बड़ी गंभीर मालूम पड़ती हैं। -कहकर मैंने उनकी तरफ नज़र डाली। उनमें कुछ हरकत सी हुई थी पर वह शायद पटा डालने के लिए थी।

— नॉट सीरियसली बट सिली। -कहता हुआ गोपाल भीतर कमीज टाँगने चला गया। खाना खाते वक्त गोपाल कुछ विरक्त सा हो रहा था। हर चौथे-पाँचवे कौर के बाद पानी पीता जाता था। हम दोनों साथ ही खा रहे थे…

भाभी ने झिझकते हुए हाथ से रोटी थाली में रख दी। गोपाल ने झट से उठाकर रोटी के चार टुकड़े कर दिए, कुछ इतनी आसानी से कि कोई खास बात नहीं थी।

— अरे, टुकड़े करने की क्या जरूरत है, गर्म तो नहीं है और मैं लखनऊआ भी नहीं, जो इतना तकल्लुफ बरत रहे हो।

… कई बार कहने पर भी जब नहीं माना तो मेरे मुँह से निकल ही गया– हद कर दी यार, तुमने भी, भई मेरी उंगलियाँ अभी साबित हैं।

यह कहकर मैं मेहमान की बू मिटाना चाहता था।

— ये रोटियाँ हैं या नक्शे, कोई अफ्रीका का, कोई अमेरिका का।

…मैं अप्रतिभ-सा हो गया। यदि मैं बार-बार न टोकता, तो शायद भाभी को यह लतीफ़ा न सुनना पड़ता।

थोड़ी देर बाद जब बाहर कमरे में आ गया, तो बड़ी अजीब सी बात सुन पड़ी। शायद बगल वाले कमरे में ही गोपाल था। काफी साफ़ सुनाई पड़ रहा था। वह कह रहा था– मैं पानी की तरह रुपया बहाकर घर को ठीक रखना चाहता हूँ और कुछ नहीं तो आज एक नया ढंग पेश किया तुमने। इसी तरह की शर्मिंदगी मुझे हमेशा उठानी पड़ती है और तुम अपने तौर-तरीकों से बाज नहीं आती।…तुम्हारी इतनी मजाल, रोटियाँ लग गईं हैं।

गोपाल तैश में कह रहा था। भाभी कुछ बोली थीं। चटाक की आवाज और गोपाल का गूँजता हुआ स्वर– यही चाहती थी न?

मैं सोचता था कौन हाथ छोड़े। नहीं समझ में आता और फिर हर बात का मुँह पर जवाब, बड़ी गंभीर बनी फिरती है।

…दूसरे दिन जब विदा होने लगा तो जी में आया कि गोपाल से उसके वहशीपन के बारे में कुछ कह दूँ पर हिम्मत नहीं हुई। बाहर निकलने लगा तो दूर से ही मैंने कहा– भाभी जी नमस्ते।

…नीची नज़र किए ही भाभी जी ने नमस्ते की। मैं सकुचा गया। वे ही सारी बातें मन को भारी किए हुए थीं… उल्लास, खीज, विद्रोह, घृणा, प्यार कुछ भी नहीं, आखिर कैसे जीती हैं वे?

घर आते-आते उदासी दूर होती गई। कमरे का ताला खोला तो पहली नज़र आए हुए पत्रों पर पड़ी… एक लिफाफे पर नज़र उलझकर रह गई। यह पत्र अवश्य ही बिनती का है, ऐसा मुझे विश्वास हो गया। बिनती आखिर आज मैं तुम्हें याद आ ही गया। दो साल बाद। कुछ दर्द-सा उठा। पत्र खोलकर पढ़ने लगा-

प्रिय राजू, आज सहसा तुम याद आए हो। वास्तव में शादी के बाद लड़की के जीवन में महान परिवर्तन होता है, विवाह के बाद पुरुष को रहन-सहन का कुछ ढंग ही बदलना पड़ता है, पर लड़कियों को तो पूरी आत्मा बदलनी पड़ती है। यह मेरा स्वयं का अनुभव है, मैंने अपनी आत्मा को बदलने की चेष्टा की है। एक कीमती आत्मा की हत्या भी इसीलिए की कि वह तुम्हें प्यार करती थी। जब मैंने इस नए घर में कदम रखा था तो यही सोचकर कि मेरी आत्मा सदैव के लिए तुम्हारे पास है और शरीर इस नए घर का है। लेकिन बहुत ईमानदारी से कहूँ, बुरा मत मानना, कुछ दिनों बाद मेरी पसलियों की काया में कुछ नरम-स्पर्श-सा महसूस होने लगा, आत्मा का स्पंदन होने लगा और तभी से इस घर के दुख-सुख मुझे सताने लगे।

मुझे तुम्हारी उदारता पर विश्वास है इसीलिए लिख रही हूँ। मेरी कही हुई बात की ईमानदारी को यदि तुमने न समझा तो मेरे साथ अन्याय करोगे। सच यह है कि मैं तुम्हें भूलने लगी थी और अब भी बहुत याद नहीं करती…

मैं यहाँ बहुत सुखी हूँ। सारे आराम यहाँ हैं। मेरी मां और पापा का अरमान कि उनकी इकलौती लड़की का रिश्ता किसी ऊँचे घर में हो, पूरा हो ही गया है। इससे भी मुझे बहुत संतोष मिलता है। शादी होने से पहले मुझे तुम्हारा मोह था… तुमसे दूर होने की सोचकर मैं घबरा जाती थी… पर अब यह सब एक मुलम्मे की तरह उतर चुका है… पर ‘ये’ जिन्हें तुम अपना ‘खुशनसीब जालिम मित्र’ कहते हो, बहुत कुछ तुम्हारी तरह ही हैं, तुम्हारी तरह ही हँसते हैं, वैसे ही बात करते हैं, उसी तरह चलते-फिरते हैं, सब अंदाज वे ही हैं। हाँ, तुम्हारी आँखें जरा अधिक गहरी हैं जिनकी बरबस मुझे याद आ गई।

…आज खाना पकाने वाली महाराजिन नहीं आई। घर की बहू हूँ मैं, खाना पकाने के लिए रसोईघर में गई, शायद पहली बार। जब वहाँ घुसी तो बरबस यह भाव जाग उठा कि तुम्हारे साथ यदि जीवन बीतता होता तो रोज ऐसे ही मुझे खाना पकाना पड़ता। तुम्हारे साथ जीवन की तमाम कल्पनाएँ मेरे दिमाग में आ-आकर समाती जा रही थीं। मुझे इस तरह रहना पड़ता, मैं यह करती, मैं वह करती, शाम को तुम्हारे आने की राह देखती, मैं खाना पकाती, तुम बीच-बीच में आकर छेड़ते, कभी दाल में पानी ज्यादा बताते तो कभी रसोईघर में गर्मी से परेशान देखकर मुझे बाहर ले जाते।

मेरी हालत अजीब-सी हो रही थी। तुम्हारी हर बात याद आने लगी। अकेले ही रोटी बनाने बैठी तो लगा जैसे तुम अभी छेड़ने आ रहे हो, तुम मेरी आँखों के सामने पूरी तरह से उभरे हुए थे, मेरी हर साँस में तुम बस गए थे। मेरे चारों ओर तुम थे। तुम्हारे पैरों की आहट हर तरफ से आ रही थी और मेरी हर रोटी टेढ़ी हो जाती थी… हर गोल बनती रोटी अपने-आप टेढ़ी होकर बदशक्ल हो जाती। यह सब मुझे बहुत अपना सा लग रहा था जैसे पुरानी आत्मा अपने पुराने रूप में मुझे वापस मिल गई हो। खाते वक्त उन्होंने हँसते हुए कहा कि वाह यह किसी खास जगह की रोटियों का नमूना है।

माता जी बोली थीं, अरे सीख जाएगी, इसमें हँसने की क्या बात, अभी आदत नहीं है।

पर राजू, मेरी आत्मा तुम्हारी आहट सुन रही थी। मैंने अपने आँसुओं को दोनों की नज़र चुराकर सुखा लिया। शायद किसी ने नहीं देखा। अगर देखा भी होगा तो समझ नहीं पाया होगा।

मैं पत्र आगे न पढ़ सका। घुटन, बेबसी, धुआँ, ठहराव, खामोशी और उसमें ऊबती हुई आत्मा। वे बेबस उठे हुए हाथ और पानी-भरी आँखें जैसे चारों ओर थीं, हर तरफ़ थीं।

 

About The Author – Kamleshwar

Kamleshwar AuthorKamleshwar was a prominent 20th-century Hindi writer, and scriptwriter for Hindi cinema and television. Among his most well-known work are the films Aandhi, Mausam, Chhoti Si Baat and Rang Birangi. He was awarded the 2003 Sahitya Akademi Award for his Hindi novel Kitne Pakistan, and also the Padma Bhushan in 2005.

कमलेश्वर हिन्दी लेखक कमलेश्वर बीसवीं शती के सबसे सशक्त लेखकों में से एक समझे जाते हैं. कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता, स्तंभ लेखन, फिल्म पटकथा जैसी अनेक विधाओं में उन्होंने अपनी लेखन प्रतिभा का परिचय दिया. उन्होंने फिल्मों के लिए पटकथाएँ तो लिखी ही, उनके उपन्यासों पर फिल्में भी बनी. १९९५ में कमलेश्वर को ‘पद्मभूषण’ से नवाज़ा गया और २००३ में उन्हें ‘कितने पाकिस्तान'(उपन्यास) के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

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