तेईस मार्च को : भगत सिंह पर लिखी गयी कुछ कवितायें

उन दिनों जब भगत सिंह को फांसी की ख़बरें सुनाई जा रही थी, लोगों ने खूब कवितायेँ लिखी उनके लिए. खूब आलेख छपे भगत सिंह और उनके विचारों के बारे में. आज इस पोस्ट में पढ़िए कुछ ऐसी ही कवितायें –तस्वीर : लाला लाजपत के द्वारा खोले गए नेशनल कॉलेज के छात्र थे भगत सिंह. उसी कॉलेज के ड्रामा सोसाइटी के इस ग्रुप फोटो में भगत सिंह भी खड़े हैं. दाहिने से चौथे स्थान पर.

मर्द-ए-मैदां चल दिया सरदार, तेईस मार्च को ।
मान कर फ़ांसी गले का हार, तेईस मार्च को।
आसमां ने एक तूफ़ान वरपा कर दिया,
जेल की बनी ख़ूनी दीवार, तेईस मार्च को।
शाम का था वक्त कातिल ने चराग़ गुल कर दिया,
उफ़ ! सितम, अफ़सोस, हा ! दीदार, तेईस मार्च को।
तालिब-ए-दीदार आए आख़री दीदार को,
हो सकी राज़ी न पर सरकार, तेईस मार्च को।
बस, ज़बां ख़ामोश, इरादा कहने का कुछ भी न कर,
ले हाथ में कातिल खड़ा तलवार, तेईस मार्च को।
ऐ कलम ! तू कुछ भी न लिख सर से कलम हो जाएगी,
गर शहीदों का लिखा इज़हार, तेईस मार्च को।
जब ख़ुदा पूछेगा फिर जल्लाद क्या देगा जवाब,
क्या ग़ज़ब किया है तूने सरकार, तेईस मार्च को।
कीनवर कातिल ने हाय ! अपने दिल को कर ली थी,
ख़ून से तो रंग ही ली तलवार, तेईस मार्च को।
हंसते हंसते जान देते देख कर ‘कुन्दन’ इनहें,
पस्त हिम्मत हो गई सरकार, तेईस मार्च को।

-कुन्दन
( १९३१ मार्च के आखिरी हफ्ते में लिखी गयी )

मरते मरते

दाग़ दुश्मन का किला जाएँगे, मरते मरते ।
ज़िन्दा दिल सब को बना जाएंगे, मरते मरते ।
हम मरेंगे भी तो दुनिया में ज़िन्दगी के लिये,
सब को मर मिटना सिखा जाएंगे, मरते मरते ।
सर भगत सिंह का जुदा हो गया तो क्या हुया,
कौम के दिल को मिला जाएंगे, मरते मरते ।
खंजर -ए -ज़ुल्म गला काट दे परवाह नहीं,
दुक्ख ग़ैरों का मिटा जाएंगे, मरते मरते ।
क्या जलाएगा तू कमज़ोर जलाने वाले,
आह से तुझको जला जाएंगे, मरते मरते ।
ये न समझो कि भगत फ़ांसी पे लटकाया गया,सैंकड़ों भगत बना जाएंगे, मरते मरते ।

-अज्ञात
( १९३१ मार्च के आखिरी हफ्ते में लिखी गयी )

हिन्दोसतान

आज़ाद होगा अब तो हिन्दोसतां हमारा,
बेदार हो रहा है हर नौजवां हमारा।
आज़ाद होगा होगा अब तो हिन्दोसतां हमारा,
है ख़ैरख़वाहे-भारत खुरदो-कलां हमारा।
वे सख़तियां कफस की, बे आबो-दाना मरना,
कैदी का फिर भी कहना, हिन्दोसतां हमारा।
इक कतले-सांडरस पर, इतनी सज़ाएं उनको,
रोता है लाजपत को, हिन्दोसतां हमारा।
बीड़ा उठा लिया है, आज़ादियों का हमने,
जन्नत निशां बनेगा हिन्दोसतां हमारा।
सोज़े-सुख़न से अपने, मजनूं हमें बना दे,
बच्चों की हो ज़बां पर, हिन्दोसतां हमारा।
इक बार फिर से नग़मा ‘अनवर’ हमें सुना दे,
‘हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोसतां हमारा।’
-अनवर
७ मार्च १९३०
लाहौर से तीन रोज़ा पत्र में प्रकाशित

डरे न कुछ भी जहां की चला चली से हम

डरे न कुछ भी जहां की चला चली से हम।
गिरा के भागे न बम भी असेंबली से हम।उड़ाए फिरता था हमको खयाले-मुस्तकबिल,
कि बैठ सकते न थे दिल की बेकली से हम।

हम इंकलाब की कुरबानगह पे चढ़ते हैं,
कि प्यार करते हैं ऐसे महाबली से हम।

जो जी में आए तेरे, शौक से सुनाए जा,
कि तैश खाते नहीं हैं कटी-जली से हम।

न हो तू चीं-ब-जबीं, तिवरियों पे डाल न बल,
चले-चले ओ सितमगर, तेरी गली से हम।

-अज्ञात

१५ जून १९२९
लाहोर से निकलने वाली उर्दू पत्रिका बन्दे मात्रिम में प्रकाशित

अगर भगत सिंह और दत्त मर गए

सख़तियों से बाज़ आ ओ आकिमे बेदादगर,
दर्दे-दिल इस तरह दर्दे-ला-दवा हो जाएगा ।

बाएसे-नाज़े-वतन हैं दत्त, भगत सिंह और दास,
इनके दम से नखले-आज़ादी हरा हो जाएगा ।

तू नहीं सुनता अगर फर्याद मज़लूमा, न सुन,
मत समझ ये भी बहरा ख़ुदा हो जाएगा ।

जोम है कि तेरा कुछ नहीं सकते बिगाड़,
जेल में गर मर भी गए तो क्या हो जाएगा ।

याद रख महंगी पड़ेगी इनकी कुर्बानी तुझे,
सर ज़मीने-हिन्द में महशर बपा हो जाएगा ।

जां-ब-हक हो जाएंगे शिद्दत से भूख-ओ-प्यास की,
ओ सितमगर जेलख़ाना कर्बला हो जाएगा ।

ख़ाक में मिल जाएगा इस बात से तेरा वकार,
और सर अकवा में नीचा तेरा हो जाएगा ।

-अज्ञात

१८ अगस्त १९२९
लाहोर से निकलने वाली उर्दू पत्रिका बन्दे मात्रिम में प्रकाशित

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  1. आज सलिल वर्मा जी ले कर आयें हैं ब्लॉग बुलेटिन की २०००वीं बुलेटिन अपने ही अलग अंदाज़ में … तो पढ़ना न भूलें …

    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, संगीत और तनाव मुक्ति – 2000वीं ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है … सादर आभार !

  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन उन युवाओं से क्यों नहीं आज के युवा : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है…. आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी….. आभार…

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