कौनहारा घाट और नेपाली मंदिर – एक रिपोर्ट

पिछले महीने जब पटना में था मैं, तब एक दिन हाजीपुर जाना हुआ. वहाँ जाने का कोई खास उद्देश्य नहीं था. मार्च का महीना था, मौसम अच्छा और सुहावना था, तो सोचा अकरम के साथ डे-आउटिंग हो जायेगी. यूँ भी अकरम अपने एनिवर्सरी की दावत दे रहा था. अब अकरम के दावत को ठुकराना तो बेवकूफी है. तो वहाँ जाने का प्लान तुरंत बना लिया. अकरम हाजीपुर में रहता है. हाजीपुर गंगा के उस पार स्थित है, और महात्मा गांधी सेतु पुल पार कर हाजीपुर जाना पड़ता है. वैसे तो हाजीपुर और पटना में कुछ भी अंतर नहीं है, जैसे दिल्ली और नॉएडा है ठीक वैसे ही हाजीपुर और पटना. लेकिन गाँधी सेतु पर जो जबरदस्त ट्रैफिक जाम होता है उसके वजह से हाजीपुर जाना आना एक कठिन काम है. लेकिन फिर भी सैकड़ों लोग हर दिन काम के लिए, दफ्तर आने जाने के लिए हाजीपुर से पटना आते-जाते रहते हैं. शाम और सुबह को ख़ास तौर पर पुल पर जाम लगता है. जाते वक़्त तो मेरी किस्मत अच्छी थी, मैं कहीं भी जाम में नहीं फंसा. वैसे तो मेरे घर से अकरम के घर की दूरी लगभग 28 किलोमीटर की है, मुझे अकरम के घर जाने में करीब डेढ़ घंटे लग गए थे.

जूनियर अकरम के साथ
अकरम के घर पहुँचा तो मेरे स्वागत के लिए अकरम और जूनियर अकरम दोनों खड़े थे. जूनियर अकरम बोले तो ईशाल, अकरम का बेटा. बहुत शरारती है और बेहद प्यारा. कुछ देर उसके साथ खेला, उसके बाद नाश्ता चाय और फिर अकरम और हम निकल पड़े घूमने. वैसे तो तय कार्यक्रम कुछ दूसरा था. अकरम मुझे कहीं और ले जाना चाहता था. लेकिन मुझे पहुँचने में थोड़ी देर हो गयी थी, और वापस भी जल्दी लौटना था इसलिए हमनें तय किया कि हाजीपुर में ही आसपास कहीं घूम लेते हैं.
अकरम और हम निकल पड़े. अकरम से पूछा कि हम कहाँ जा रहे? उसनें कुछ नहीं बताया. बस इतना कि एक अनोखी जगह जहाँ कम लोग जाते हैं जिसके बारे में लोगों को शायद नहीं पता. मुझे कुछ कुछ समझ तो आ रहा था. मैंने मन ही मन सोचा ये मुझे कोई प्राचीन मंदिर या किला घुमाने ले जा रहा है. लेकिन मैं पक्के तौर पर कुछ सोच नहीं पा रहा था. लेकिन फिर भी इतना तो मैं समझ ही गया था कि हम नदी किनारे जा रहे हैं. इसकी दो वजह थी. पहली ये कि अकरम से इतना सुन चुका था कि उसका घर नदी तट के पास है, और कैसे अपने स्कूल के दिनों में वो वहाँ अपना खाली वक़्त बिताया करता था. यहाँ तक कि पढ़ने के लिए भी वो नदी किनारे चला आया करता था. तब से ही हम जाने कितनी बार कार्यक्रम बना चुके थे कि अपना दिन कभी वैसे ही नदी किनारे बिताएंगे लेकिन कभी वैसा मौका नहीं मिल पाया.
नदी के पास जाने के दो रास्ते थे. एक जो मुख्य सड़क से ही सीधा रास्ता जो घाट के पास ही निकलता है, दूसरा गाँव होकर एक रास्ता नदी किनारे जाता है. अकरम मुझे जानबुझकर उस रास्ते से ले गया. अकरम ने कहा, दिल्ली रहते हो तुम, पटना रहते हो. इस माहौल में भी थोड़ा वक़्त बिताओ. घाट पर जा रहे हैं तो गाँव में होने का एक हल्का एहसास भी तो लो तुम. सच में ये बहुत अच्छा काम किया था अकरम ने. उन रास्ते से गुज़रते हुए, उन गलियों से गुज़रते हुए मुझे हर वक़्त अपने गाँव की याद आ रही थी जहाँ बहुत अरसे से नहीं गया.
हम कौनहारा घाट पहुँच गए थे, वहाँ जाकर बड़ी शान्ति महसूस हुई. कौनहारा घाट गंगा–गंडक नदियों के प्रमुख घाटों में से एक है. कौनहारा घाट के बारे में ज्यादा नहीं पता था, बस जो मूल कहानी थी वो जानता था मैं, लेकिन मेरे साथ एक एक्सपर्ट गाइड था, अकरम ने बताया मुझे कौनहारा घाट के बारे में. वैसे तो यहाँ सदियों से कई लोग अनुष्ठानों के लिए और अंतिम संस्कार के लिए आते हैं. लेकिन इसके साथ साथ एक प्राचीन कथा भी है. जिसके अनुसार जब गज यानि हाथी और ग्राह यानी मगरमच्छ के बीच एक वर्षों चलने वाला युद्ध हुआ जिसमें अपने भक्त गजराज को बचाने के लिए भगवान विष्णु को आना पड़ा था. भगवान विष्णु की सहायता से गजराज की विजय हुई थी. एक और प्रचलित कथा है जिसके अनुसार जय और विजय दो भाई थे. जय शिव के भक्त थे तो विजय विष्णु के भक्त थे. दोनों भाई में झगड़ा हो गया और दोनों गज और ग्राह बन गए. बाद में दोनों में दोस्ती हो गयी थी, और वहाँ फिर शिव और विष्णु दोनों के मंदिर साथ साथ बनाए गए और लोग उस समय इस जगह को हरिहरक्षेत्र बुलाने लगे. वहाँ एक छोटा विष्णु मंदिर है, जिसपर मेरा ध्यान अकरम ने दिलाया. मंदिर पर जहाँ एक तरफ नाम हरिपुर लिखा है, वहीँ दूसरे तरफ हाजीपुर. ये एक छोटा सा विवाद भी है जिसके बारे में अकरम ने बताया. बहुत से लोग इस जगह को हाजीपुर न बुलाकर हरिपुर बुलाते हैं.
कौनहारा घाट पर लोगों की भीड़ हमेशा दिखाई पड़ती है, एक तरफ जहाँ लोग अंतिम संस्कार के लिए आते हैं, वहीं दूसरे तरफ है नेपाली शिव मंदिर. नेपाली मंदिर का निर्माण मठबार सिंह थापा ने किया था. वो मध्यकालीन युग में नेपाल के सेनापति थे. इस भव्य मंदिर की वास्तुकला देखना लायक है, बेहद सुन्दर. यह वास्तुकला पगोड़ा शैली को प्रदर्शित करती है. मंदिर में लड़की द्वारा नक्काशी की गयी है मूर्तियाँ हैं जो बेहद भव्य दिखते हैं. लकड़ियों पर स्त्री-पुरुष के विभिन्न कलात्मक चित्र को देख खजुराहो की याद आती है. शायद इसलिए कुछ लोग इसे बिहार का खजुराहो भी कहते हैं. नेपाल की वास्तुकला का अद्भुत नमूना इस मंदिर में दिखता है.
बहुत कम लोग इस दुर्लभ मंदिर के बारे में जानते हैं. ये मंदिर भी लेकिन रखरखाव की कमी के वजह से जर्जर होती जा रही है. कई दुर्लभ कलाकृतियां और मूर्तियां धीरे-धीरे यहाँ से गायब होती गयी हैं. कहा जाता है नेपाली सैनिक कभी इस मंदिर के इर्दगिर्द छावनी बना कर रहा करते थे, इस कारण इसका एक नाम नेपाली छावनी मंदिर या नेपाली मंदिर पड़ गया.
यह नेपाली मंदिर बिहार पुरातत्व विभाग द्वारा सुरक्षित है लेकिन फिर भी इसकी देख रेख ना के बराबर है. मंदिर बेहद जर्जर स्थिति में है, ये एक बेहद दुर्लभ स्मारक है और अगर इसकी सही से देखरेख नहीं की गयी तो ये मंदिर शायद ही बचे. जगह जगह से इसके लकड़ी के नक्काशी निकल गए हैं तो मंदिर कलात्मक लकड़ी  कला पर दीमक और कीड़े लग चुके हैं जो धीरे-धीरे उस पूरे कला को बर्बाद कर रहे हैं. मंदिर के पत्थर भी टूटने लगे हैं और सीढ़ियों की स्थिति भी बेहद ख़राब है. लापरवाही के कारण मंदिर की स्थिति बेहद ख़राब हो गयी है.
कितना दुःख हुआ ये देखकर कि इतने खूबसूरत मंदिर का ऐसा हाल हो गया है. अकरम खुद यहाँ काफी अरसे के बाद आया था, और उसे भी आश्चर्य हुआ कि इस मंदिर की हालत ऐसी हो गयी. बावजूद इसके कि यहाँ पास में ही लोग अंतिम संस्कार के लिए आते हैं, इस मंदिर को आसानी से एक टूरिस्ट स्पॉट बनाया जा सकता है. लेकिन इस तरफ ध्यान किसी का नहीं. अकरम के मुताबिक मई जून की झुलसा देने वाले गर्मी के बावजूद ये घाट एकदम ठंडा रहता है. हम काफी वक़्त बिता कर लौटे वहाँ से. कुछ तस्वीरें हैं, आप भी देखिये.
नेपाली मंदिर
वास्तुकला का सुन्दर नमूना 

 

 

नेपाली मंदिर का गलियारा

 

छत की बाउंड्री पूरी टूटी हुई है

 

कलाकृतियां

 

कलाकृतियां जिनमे दीमक लग गयी है. ऐसे जाने कितने कलाकृतियां हैं जो ख़राब हो रहे हैं 
साफ़ लिखा हुआ कि छत टुटा हुआ है. अकरम ने बताया मुझे, पहले लोग छतों पर भी चढ़ते थे
नेपाली मंदिर के शीर्ष पर लगा ये त्रिशूल
सोनपुर पुल

 

नदी किनारे

 

अकरम के कैमरा का ज़ूम का कामाल. नदी के पार ये मंदिर है
चाय दुकान कौनहारा घाट पर
कौनहारा घाट जाने के रास्ते में हाजीशाह का ये मजार है. अकरम ने बताया कि इसी से शहर का नाम हाजीपुर रखा गया है.

 

 

 

अकरम के घर वापस लौट कर बेहद लजीज खाना खाया. खाना का श्रेय अकरम को तो हरगिज़ नहीं दूँगा, खाने का पूरा श्रेय जाता है आलिया को. हाँ, अकरम को क्रेडिट इसलिए देना चाहिए कि उसे ये बात याद रही कि मुझे सेवई बहुत पसंद है और उसनें मेरे लिए सेवई बनवाई थी. कुछ देर अकरम के ही घर पर बैठकर बातें हुई और जूनियर अकरम के साथ कुछ समय बिताया मैंने.
वापस मैं वक़्त पर ही लौट गया था, लेकिन इस बार लौटने समय भीषण जाम में फंस गया, गांधी सेतु पुल पर जबरदस्त जाम लगा था. गांधी सेतु पुल देश का दूसरा सबसे बड़ा पुल है जिसकी लम्बाई करीब सात किलोमीटर की है. ये पुल पटना को उत्तरी बिहार से जोड़ता है. गांधी सेतु पुल पर जाने कितने वर्षों से मरम्मत का काम चल रहा है जिसकी वजह से पुल का कुछ हिस्सा वन वे रहता है, मतलब एक ही लेन खुली होती है. जाम लगने का मुख्य वजह यही होता है अकसर. गांधी सेतु पुल को एक इंजीनीयरिंग मार्वल कहा जाता है. ये पूरा पुल स्प्रिंग पर बना हुआ है जिससे पुल पर जब गाड़ियाँ स्थिर होती है तो पुल ऊपर नीचे डोलते रहता है और उसके साथ आपकी गाड़ी भी ऊपर नीचे डोलती रहती है. अब इसे मेरी बेवकूफी कहिये, मैं अरसे के बाद गांधी सेतु पुल पर जा रहा था तो मैं भूल सा गया था इस बात को. शुरुआत में तो मुझे थोड़ा डर लगा, ये पुल ऐसे डोल क्यों रहा है? फिर याद आया अच्छा, ये तो ऐसे डोलता ही है, स्प्रिंग पर जो बना है.
अच्छे पलों की यादें लेकर वापस घर लौटते हुए. गांधी सेतु पुल की एक तस्वीर
करीब एक घंटे जाम में फंसने के बाद पुल पार कर पाया मैं, लेकिन फिर भी इसका कोई अफ़सोस भी नहीं था. ये अजीब भी था न, जाम से आमतौर पर लोगों को चिढ़ हो जाती है लेकिन मुझे ना चिढ़ हो रही थी ना गुस्सा आ रहा था. जाने कितनी बातें याद आ रही थीं मुझे. आसपास पटना से दूसरे शहर जैसे मुज्ज़फरपुर, बेगुसराय और छपरा आने जाने वाले बसों को देखकर वे दिन याद आ रहे थे जब बस में बैठकर हम गाँव जाते थे. पुलों पर से गुज़रना उस वक़्त बड़ा मजेदार लगता था. हम इंतजार करते थे कि बस कब पुल से गुज़रे. बहुत सी यादों को साथ लेकर मैं वापस पटना आया था. इन सब बातों को लिखने का तभी से मन था, लेकिन टलता आया. आज लिख रहा हूँ अपने उस डे-आउटिंग की रिपोर्ट.

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  1. इसमें से कितनी कुछ बातें तो तुमसे सुन ही चुके थे न…आज सब फिर से याद आ गई…| ये सब नेपाली मंदिर की छत एक जैसी ही होती है न…? और वो अकरम के कैमरे से खींची गंगा किनारे की कुछ और तस्वीरें काहे छुपा गया रे…:P

  2. सुन्दर ,सचित्र जानकारी ..इस बहाने हम भी घूम लिए यहाँ ..

  3. यात्रा वृतांत पढ़कर बहुत मजा आया …
    नेपाली मंदिरों की आकृति लगभग एक जैसी देखने को मिलती हैं इसकी वास्तुकला देखते ही बनती हैं …कौनहारा घाट का सुन्दर चित्रण और हाजीपुर की बारे में जानकार अच्छा लगा ….
    इसी बहाने घूम लेते हैं हम भी ..

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