अमृतसर यात्रा – १ – जलियाँवाला बाग और स्वर्ण मंदिर

 
उन दिनों मैं दसवीं कक्षा में था.करीब दो महीने से मेरी तबियत खराब थी और मैं घर से बाहर निकलता नहीं था.मेरे एक दो मित्र लगभग हर शाम मुझसे मिलने आते थे.एक मित्र ने एक दफे एक इतिहास की किताब मुझे लाकर दी, और कहा इस किताब को जरूर पढ़ना…वो किताब हमारे पाठ्यक्रम में था नहीं बल्कि विशेष रूप से भारतीय क्रांतिकारियों के बारे में था. मैंने वो किताब लगभग पूरी पढ़ डाली थी.मुझे किताब या लेखक का नाम तो याद नहीं, कुछ याद है तो वो ये कि किताब पर
पुराने अखबार का जिल्द चढ़ा हुआ था और किताब बहुत ही मोटी और पुरानी जान पड़ती थी..
जिसके पन्ने कहीं कहीं से फटे हुए थे.मैंने स्कूल की
किताबों में भारतीय क्रान्ति और क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ा तो जरूर था लेकिन इतने
विस्तार से भारतीय क्रान्ति के बारे में पढ़ने का वह मेरा पहला अवसर था.सरदार भगत
सिंह के बारे में भी मैं पहले स्कूल के इतिहास के किताबों में पढ़ चुका था
, कई लेख
भी लिख चुका था
, लेकिन उस किताब के माध्यम से मुझे उनके बारे में
बहुत सी बातें मालुम चली
, जो स्कूल के किताबों से कभी मालुम ना
चलती.किताब में
 जलियाँवाला बाग हत्याकांड पर भी काफी
विस्तार से लिखा गया था
.उन दिनों घर में बैठे मैं अक्सर सोचा
करता था कि कैसा होगा वो हैवानियत भरा हत्याकाण्ड जिसने पुरे हिन्दुस्तानी
क्रान्ति का रुख ही बदल दिया था..कितना क्रूर और दिल दहला देने वाला वो हत्याकांड
होगा जिसने एक बारह साल के बच्चे को शहीदे
आज़म सरदार भगत सिंह बना दिया और जिसे महज तेईस साल
की उम्र में फांसी दे दी गयी थी
.
 
उस किताब को पढ़ने के बाद मैंने तय किया कि कभी न
कभी मैं जलियाँवाला
बाग जरूर जाऊँगा.लेकिन वहाँ जाने का मुझे कभी अवसर नहीं मिला. ना तो अमृतसर में
कोई काम ही पड़ता है और नाही वहाँ कोई जान-पहचान वाले ही रहते हैं, तो ऐसी सूरत में में अमृतसर जाने का एकमात्र उद्देश्य
 जलियाँवाला बाग को देखना ही था.लेकिन बस घूमने के लिए अमृतसर जाने का प्लान कभी बन ही नहीं पाया.दिल्ली कई बार आया और सोचा कि अमृतसर नज़दीक है तो घूम आऊं, लेकिन कभी कोई निश्चित कार्यक्रम ही नहीं बना.ऐसे में कुछ महीने पहले मेरी बहन जालंधर शिफ्ट हुई, तो एकाएक मुझे लगा अब अमृतसर का प्लान बनाने में ज्यादा आसानी होगी.मुझे दिल्ली आए भी तीन महीने हो गए, और जालंधर-अमृतसर जाने का प्लान इन तीन महीनो में बनता और टलता रहा.पिछले महीने माँ-पापा जब जालंधर घूमने गए, तो इस बार मैंने भी मौका निकाल कर जालंधर जाने का और वहाँ से अमृतसर घूम आने का कार्यक्रम बना ही लिया.
 
मेरे जालंधर पहुँचने के बाद ये तय हुआ कि अमृतसर हम सुबह जायेंगे और रात तक वापस आ जायेंगे.वहाँ पहले हम
स्वर्ण मंदिर घूमेंगे, फिर जलियाँवाला बाग और अंत में वाघा बोर्डर.मेरे परिवार में सभी लोगों का अमृतसर जाने का उद्देश्य स्वर्ण मंदिर को देखने का था, जबकि मेरा अमृतसर जाने का एकमात्र उद्देश्य था कि जलियाँवाला बाग जाकर वहाँ १३ अप्रैल
१९१९ जो हुआ, उसे महसूस करूँ.उस मिट्टी को छू कर देखूँ, उस जगह की रूह को महसूस करूँ
जिसने सैकड़ों हिंदुस्तानियों के दिल में क्रान्ति की एक नई मशाल जगा दी थी
 और जिस घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था. 
 
हम अमृतसर के लिए सुबह सुबह ही निकल गए.मुझे पहले
से मालुम था कि जलियाँवाला बाग स्वर्ण मंदिर के निकट ही है.लेकिन ये बिलकुल भी
मालुम नहीं था कि स्वर्ण मंदिर जाने के रास्ते में हमें जलियाँवाला बाग से होकर ही गुजरना पड़ेगा.गाड़ी एक बड़े से पार्किंग प्लेस में पार्क कर के जैसे ही हम सड़क की
तरफ मुड़े तो सामने सर उठाये जलियाँवाला बाग खड़ा था.उस ईमारत को देखते ही मेरे कदम
दो पल के लिए वहीँ ठिठक गए.कुछ देर मैं अपलक उस ईमारत की तरफ देखता रहा.फिर वो सारे किस्से जो मैंने अब तक इस जगह के बारे में पढ़े थे किताबों में, देखे थे फिल्मों में, एक के बाद एक नज़रों के सामने आते गए. गेट के पास पहुँचते ही मेरे मुहँ से निकल गया “यही 
जलियाँवाला बाग है” , जिसे सुन माँ ने कहा की “हाँ, हम स्वर्ण मंदिर से लौटते वक्त यहाँ आयेंगे”.माँ के मुहँ से पहले स्वर्ण मंदिर जाने के बारे में सुन और ये सोच की वहाँ हमें कम से कम दो तीन घंटे लगेंगे,पता नहीं क्यों स्वर्ण मंदिर जाने की मेरी ईच्छा ही मर सी गयी.
 
हालांकि स्वर्ण मंदिर में दाखिल होते ही मुझे उसकी भव्यता ने मोह लिया.अब तक जिस जगह को सिर्फ फिल्मों और टेलीविजन पर देखा था, उसे सामने से देखने का अनुभव ही कुछ और था.गर्मी अपने चरम पर थी, इसलिए हम वहाँ ज्यादा देर बैठ नहीं सके, बस दर्शन कर और प्रसाद लेकर हम वापस आ गए.वहाँ अगर चिलचिलाती गर्मी न होती, तो कुछ देर बैठा जा सकता था.मैंने तब सोचा की यहाँ सर्दियों में फिर से आऊंगा, और जाड़े की गुनगुनी धुप में बैठ कर इसकी भव्यता का आनंद लूँगा.इतना विशाल और आकर्षक मंदिर मैंने शायद ही पहले कभी देखा हो, लेकिन फिर भी जब मैं दर्शन के लिए लाइन में खड़ा था, तब मेरी नज़र बार बार घडी पर जा रही थी, और मैं लाइन की धीमी रफ़्तार से इरिटेट हो रहा था.शायद मुझे जलियाँवाला बाग जाने की सच में बहुत जल्दी थी.
 
इसी संकरे रास्ते से जनरल डायर ने अपनी फ़ौज अंदर लायी थी
जब जालिंवाले बाग के मेन गेट के पास पहुंचा तो
सामने वो संकरी गली थी जहाँ से जनरल रेजीनॉल्ड डायर की फ़ौज अंदर आई थी और अंधाधुन्द गोलियाँ चलानी शुरू कर दी थी.मैं गली से गुज़रते हुए सामने आया तो एक पत्थर दिखा
जिसपर लिखा हुआ था  “गोलियाँ यहीं से चली थीं”.मैं एकदम से वहीँ पर ठिठक गया.पीछे
मुड कर देखा तो वहाँ वही संकरा रास्ता था जहाँ से मैं अंदर आया था और जो अभी खामोश है, लेकिन आज से 
तिरानवे साल पहले
जहाँ से नब्बे सैनिक हाथों में बन्दुक लिए अंदर आए थे और दस मिनट के भीतर ही करीब 1600 राउंड गोलियाँ चलाई गयीं थी.एकाएक मेरी आँखों के सामने उस हैवानियत के दृश्य घूम गए.मैंने नज़र उठाकर देखा देखा तो
आगे विशाल पार्क था जहाँ पर कभी खाली मैदान रहा होगा जिसमे सालों पहले बैसाखी के दिन करीब पांच हज़ार लोग एक शांतिपूर्ण सभा के लिए एकत्र हुए होंगे और उसी मैदान को अब एक आधुनिक पार्क में तब्दील कर दिया गया है जहाँ लोग तरह तरह के पोज देकर तस्वीरें खीचा रहे थे और पिकनिक मना रहे थे.
शहीदी कुआं..गोलियों से बचने के लिए
लोग इसी कुँए में कूद गए थे…
१२० लोगों के शव निकाले गए थे इसमें से..
पार्क के एक कोने पर वो कुआँ दिखाई दिया जिसमे
गोलियों से बचने के लिए लोगों ने छलांग लगा दी थी.कुँए के अंदर झाँक कर देखा तो कुआँ एकदम
शांत सा था, मुझे लगा की इसी शांत कुँए में एक समय कितने लोगों की चीखें गूंजी
होंगी.लोहे की बनी खिड़की से हाथ अंदर डाल जब उस कुँए की तस्वीर लेना चाहा तो मेरे
हाथ पता नहीं किस अनजाने भय से काँपने लगे थे.मैंने जल्दी से फोटो लिया और अपना हाथ झटके से बाहर निकाल दिया.उसके बाद फिर दुबारा मैं उस कुँए में झाँकने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाया.कुँए के ही पास के एक दीवार पर गोलियों के अठाईस निसान मौजूद थे, जिसे देखने के बाद उन निशानों को छू कर महसूस
करने की बहुत तमन्ना हुई, लेकिन दीवारों के आगे शीशे के बैरिकेड से लगे हुए
थे.मैं कुछ देर उस दीवार को देखता रहा और फिर अचानक से मैं मुड़ कर उस संकरे रास्ते की तरफ देखने लगा जहाँ से जनरल डायर ने बिना कोई चेतावनी दिए,सैकड़ों निर्दोष लोगों को मारने के उद्देश्य से गोलियाँ चलवाई थी.एकाएक ये सोच कर कि लोग गोलियों से बचने के लिए कुँए में कूदे होंगे और दीवार को लांघने की कोशिश किये होंगे,मेरे अंदर एक सिहरन सी दौड़ गयी.मुझे उस समय लगा कि बस
जलियाँवाला बाग के बारे में पढ़ने से, उस हत्याकांड के बारे में सोचने से ही जब हम अंदर तक काँप जाते हैं, तो उन लोगों की मानसिक स्थिति क्या रही होगी, वे लोग क्या महसूस किये होंगे जो इस हत्याकांड के गवाह थे.जब आसपास के लोगों ने गोलियों की आवाज़ सुनी होगी और फिर फ़ौज के चले जाने के बाद यहाँ आयें होंगे,उन्हें कैसा महसूस हुआ होगा…हम शायद इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते.
पार्क में ही एक छोटी सी गैलरी बनी हुई है जहाँ पर इस पार्क से जुड़े मुख्य लोगों के नाम और उनके बारे में छोटा सा एक परिचय दिया गया था.उधम सिंह की तस्वीर देखी, तो उनका वो संकल्प याद आ गया जो उन्होंने पार्क में घायल होने पर लिया था और जिसे उन्होंने लन्दन में गवर्नर मायकल ओ डायर को मार कर पूरा किया था.समय की कमी
की वजह से और गर्मी के कहर की वजह से हम वहाँ ज्यादा देर रुक नहीं पायें..लेकिन
जितनी देर भी मैं वहाँ था, उतनी देर आँखों के सामने उस हैवानियत के दृश्य घूमते
रहे.
वहाँ खड़ा होकर एक पल सोचा मैंने, कि ये वही जगह है
जहाँ की मिट्टी को माथे से लगाकर सैंकडों नौजवानों ने देश को आजाद कराने का दृढ़
संकल्प लिया था, और लोग आज इसे महज एक पार्क की हैसियत से देखने और घूमने आए हैं, पिकनिक मनाने और तस्वीरें खीचाने आयें हैं.गोलियों के निसान वाली दीवार के पास या या शहीदी कुआँ पर मुझे नहीं लगता कि  तरह तरह के मजाकिया पोज देकर तस्वीरें खीचना उचित है, लेकिन फिर भी लोग ऐसा कर रहे थे.मुझे उस समय सच में शर्म सी आ गयी, क्या हम सच में इतने असंवेदनशील हो गए हैं की इस तरह के एतिहासिक जगह या इमारतों की सही इज्ज़त करना भी नहीं जानते?
 
कुछ और तस्वीरें  : 
 
शहीदी कुआँ
दीवारों पर गोलियों के निसान
पार्क का आधुनिकीकरण

 

यहीं पर से चली थी गोलियाँ
 

Get in Touch

  1. बर्बरता और जघन्यता का पर्याय है यह घटना..

  2. न जाने कितनी बार पढ़ी है यह घटना और महसूस की है. पर आज तुम्हारे विवरण ने जैसे सामने होते दिखा दी…
    ऐसी जगह कोई भी मजाकिया पोज देकर फोटो कैसे खिचवा सकता है?????.

  3. स्वर्ण मंदिर तो हमें भी जाना है, पता नहीं क्या आकर्षण है और जलियाँवाला बाग तो कभी भूल ही नहीं सकते ।

  4. अक्षर ब अक्षर महसूस किया..तुमने तो उस दिन को सामने ला खड़ा कर दिया..

  5. इस घटना को पढ़ा और देखा तो बहुत है फिल्मों में मगर यहाँ जाकर उस मिट्टी को छूने का महसूस करने का आज भी मेरा मन बहुत करता है। आपको भी वहाँ की मिट्टी ज़रूर लानी चाहिए थी। गोलियों के निशान और कुआ देखकर एक अजीब सी feeling होती है मुझे ऐसा लगता है जैसे सब अभी भी सामने ही हो रहा हो एकदम live…
    सही में ऐसी जगह कोई भला पोज देकर फोटो कैसे खिचवा सकता है ??? हमे तो यह फोटो वाली बात पढ़कर ही शर्म आरही है आपने अपनी आँखों से यह सब देखा कैसे…. और देखा तो एक आद को टोंका क्यूँ नहीं ?

  6. सही में यार यह फोटो वाली बात पढ़कर तो लगता है जब अपना ही सिक्का खोटा है अर्थात अपने देश के लोग ही ऐसे पवित्र स्थल को मज़ाक बनाने से नहीं चूकते तो औरों को क्या कहे हम और किस मुंह से कहे। proud to be Indian…

  7. बहुत दुखद दिन था वो हर देशवासी के लिए ….. यहाँ जाने का मेरा भी बहुत मन है….

  8. कितनी बड़ी क़ीमत चुकाई गयी थी हमारी आज़ादी के लिये, और हमें इस बात का अहसास भी नहीं रहता। इस पोस्ट के लिये बहुत शुक्रिया!

  9. आपके इस खूबसूरत पोस्ट का एक कतरा हमने सहेज लिया है आज के ब्लॉग बुलेटिन के लिए , आप देखना चाहें तो इस लिंक को क्लिक कर सकते हैं

  10. जानते हो अभि , जब मैं दूसरी बार जालियांवाला बाग गया था तब भी मुझे पहली बार जाने की यादें कुछ कुछ मेरे मानस पटल भी थीं बेशक बहुत धुंधली ही सही । तुम्हारी ही तरह मैंने भी बहुत कुछ महसूस किया था और बेध्यानी में या शायद अति भावुकता में सब कुछ मोबाइल के कैमरे में सहेजता चला गया वो भी जिसके लिए लिखा था कि फ़ोटो खींचना मना है । यादगार रहा था वो सफ़र मेरे लिए भी इसे यहां देख पढ सकते हो

  11. आपने सही कहा हमारी संवेदनाएं मर गई हैं और इतिहास की इज्जत करना तो हमने सीखा ही नही ।
    पर आपका लेख पढ कर मेरे भी रोंगटे खडे हो गये । लगा जैसे महसूस कर रही हूँ घटना को ।

  12. आपके विवरण ने दृश जैसे सजीव कर दिए… मन सिहर गया!
    शहीदों को नमन!

    दर्शनार्थ चित्र प्रस्तुत करने के लिए आभार!

  13. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (23-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!

  14. chitron aur aapke lekh ne mano aankho me vo sab ghatnaaye chalchitr ki tarah pesh kar di.

    jab jab aisi ghatnaaye padhne ko milti hai dil dukh se sarabor ho jata hai.

  15. Amritsar is a beautiful place. It has places of historical importance, religious importance and is a paradise for food lovers 🙂

  16. जिस संकरी गली का तुम ने बार बार जिक्र किया है जानते हो उसने कितनों की जाने बचा दी उस काले दिन … जनरल डायर वहाँ मशीन गन लगा हुआ टैक लाना चाहता था … सोचो जब 303 की राइफल से उसने 1600 गोलियां 10 मिनट के भीतर चलवा दी तो मशीन गन वहाँ कितना तांडव करती !??

    शहीदो को भूल जाना एक आदत सी बन गयी है इस लिए जलियाँवाला बाग अब सिर्फ एक पार्क बन गया है … शायद … अफसोस … हम – तुम जैसे पागलों की कमी सी होती जा रही है इस देश मे !

  17. उफ़…तुमने तो जैसे अपनी नज़र से सारी तस्वीर खींच दी उस भयानक मंज़र की…| सच में बहुत शर्मिन्दगी की बात है कि उस जगह दफ़न दर्द को महसूसने की बजाए लोग वहाँ आनंद मनाने जाते हैं…|
    दिल से लिखी दिल को छूने वाली पोस्ट…

  18. आभार …ऐसी पोस्ट्स याद दिलाती हैं कि हमें ये कभी नहीं भुलाना चाहिए …विनम्र नमन

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Get in Touch

19,718FansLike
2,187FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

Latest Posts

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर : शिक्षक दिवस पर खास

सुदर्शन पटनायक द्वारा बनाया गया, चित्र उनके ट्विटर से लिया गया आज शिक्षक दिवस है, यह दिन भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉ....

तीज की कुछ यादें, कुछ अभी की बातें और एक आधुनिक समस्या

इस साल के तीज पर बने पेड़कियेबचपन से ही तीज का पर्व मेरे लिए एक ख़ास पर्व रहा है. सच कहूँ तो उन दिनों इस...

एक वो भी था ज़माना, एक ये भी है ज़माना..

बारिश हो रही हो, मौसम सुहाना हो गया हो और ऐसे में अगर कुछ पुराना याद आ जाए तो जाने क्या हो जाता है...

बंद हो गयी भारत की सबसे आइकोनिक कार, जानिये क्यों थी खास और क्या था इतिहास

Photo: CarToqपिछले सप्ताह, अचानक एक खबर आँखों के सामने आई, कि मारुती अपनी गाड़ी जिप्सी का प्रोडक्शन बंद कर रही है. एक लम्बे समय...

आईये, बंद दरवाजों का शहर से एक मुलाकात कीजिये

यूँ तो साल का सबसे खूबसूरत महिना होता है फरवरी, लेकिन जाने क्यों अजीब व्यस्तताओं और उलझनों में ये महिना बीता. पुस्तक मेला जो...