गॉन इन सिक्सटी सेकण्ड – एक फिल्म और उससे जुड़ी यादें

कारों के बारे में जानकारी इकठ्ठा करने का फितूर हमेशा से मुझे रहा है.कभी कभी तो ऐसा भी पागलपन किया है मैंने की जिसे सुन लोग हँसेंगे भी.कुछ साल पहले मुझे ये फितूर चढ़ा की कारों से सम्बंधित अभी तक जितनी भी फ़िल्में बनी हैं, सभी देखनी है.वैसे कुछ कार-थीम पे बनी फ़िल्में मैं देख चूका था लेकिन फिर भी बहुत सी फ़िल्में ऐसी थी जिसे मैंने देखा नहीं था.हिन्दी में तो ऐसी फिल्म शायद ही बनी हो जो पुरे तरह से कारों पे केंद्रित हो, तो मैंने कुछ गिने चुने 20-25 अंग्रेजी फिल्मों के नाम पता किये.सबके नाम लिखे गए.इन्टरनेट पे सबके डाउनलोड लिंक खोजे गए और फिर डाउनलोड कर के देखे भी गए.ये पोस्ट भी उन्ही जैसी कार-थीम-फिल्मों को समर्पित है जिसे हर कर प्रेमी देखना पसंद करेंगे.सभी फिल्मों के बारे में संक्षिप्त रूप से बताया यहाँ असंभव है.इसलिए मैं अपने पसंद की कुछ गिनी चुनी फिल्मों का जिक्र इस पोस्ट में करूँगा..ताकि अगर आप भी कारों पे बनी फ़िल्में देखना चाहें तो आपको दिक्कत न हो.

इसकी शुरुआत हुई थी साल 2000 में, जब मैंने पहली बार डोमनिक सेना निर्देशित ‘गॉन इन सिक्सटी सेकण्ड’ फिल्म देखी थी.इस फिल्म ने मुझपर गज़ब का असर किया.इस फिल्म को देखने के बाद गाड़ियों के प्रति आकर्षण तो बढ़ा ही साथ ही साथ मैं दूसरी नज़र से गाड़ियों को देखने लगा..उनके टेक्नीकल पक्ष और बाकी खूबियों के साथ उन्हें समझने की कोशिश करने लगा..पहले तो बस जिसका लुक बेहतर लगा, वही बेहतर कार भी लगती थी.मैं फिल्म के किरदार ‘रैंडल मेम्फिस रेन्स'(एक्टर-निकलस केज) से बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ.उन दिनों शायद ही किसी फिल्म के किरदार ने मुझपर ऐसा असर किया हो.मैंने दुबारा, तिबारा ये फिल्म देखी…फिल्म की कहानी अगर कहूँ तो बहुत सिंपल सी है..रैंडल मेम्फिस रेन्स एक पेशेवर रिटायर्ड कार-चोर है.उसने अपनी माँ से वादा किया है वो फिर कभी कारों की चोरी नहीं करेगा.लेकिन उसका छोटा भाई उसके नक़्शे-कदम पर चलते हुए एक कार-चोर बन जाता है और एक बड़ी मुसीबत में फंस जाता है.उसे मुसीबत से बाहर निकालने के लिए मेम्फिस को फिर से इस धंधे में आना पड़ता है और उसे 50 गाड़ियों को चुराने का काम मिलता है.अगर वो ये काम पूरा नहीं कर करेगा तो उसके भाई की जान खतरे में पड़ेगी.मेम्फिस अपने पुराने साथियों की खोज करता है और 24 घंटे के अंदर 50 इग्ज़ाटिक गाड़ियां चुराता है..फिल्म में कुछ खास ट्विस्ट-टर्न नहीं हैं, एक सीधी लीक पर बनी फिल्म है ये, लेकिन जो कारों के बारे में दिलचस्पी रखते हैं, उनके लिए फिल्म में बहुत कुछ मौजूद है.फिल्म का कार-टेक्नीकल पार्ट और एक्सन बहुत जबरदस्त हैं.इस फिल्म के दो मुख्य किरदार हैं..निकलस केज और एलेनोर(1967 Ford Mustang Shelby GT500).

फिल्म का सबसे खूबसूरत सीन

एलेनोर जी.टी 500 एक वैसी कार है जिसे मेम्फिस चुराने से डरता है.वैसे है तो ये मेम्फिस की महबूबा है, लेकिन जब कभी वो इसे चलाता है, कुछ न कुछ गडबड जरूरी होती है.दोनों का साथ बहुत पुराना है, कई बार एलेनोर ने मेम्फिस की जान बचाई है, और कितने ही बार मेम्फिस ने एलेनोर को बचाया है.फिल्म का वो सीन जहाँ मेम्फिस एलेनोर से बातें करता है, फिल्म का सबसे खूबसूरत सीन है.मैं उस सीन को बहुत अच्छे से महसूस कर सकता हूँ, रिलेट कर सकता हूँ.मैं जब भी ये फिल्म देखता हूँ, मेम्फिस रेन्स की कारों के प्रति अविश्वसनीय दीवानगी मुझे हमेशा अपने तरफ खींचती है.उसके गाड़ियों के प्रति नज़रिए ने मुझपर एक गहरा असर डाला था.और ये कहना गलत नहीं होगा की मेरी कारों के प्रति दीवानगी बढ़ाने में इस एक फिल्म का सबसे बड़ा हाथ रहा है.

कुछ फिल्म-आलोचकों ने इस फिल्म को लताड़ा भी है लेकिन बड़ी बात ये रही की दर्शकों ने फिल्म को खूब सराहा.ये हर दृष्टिकोण से एक रोमांचक फिल्म है,जिसमे एक्सन भी है,जबरदस्त कार-सिक्वेंस हैं, बेहद अच्छी कॉमेडी भी है और कुछ भावुक पल भी हैं.इस फिल्म को बुरा कहने का मुझे तो एक भी पॉइंट नहीं दीखता.ये मैं शर्त लगा के कह सकता हूँ की जिन्हें कारों में खास दिलचस्पी नहीं है, वो भी इस फिल्म को देख रोमांचित हुए बिना नहीं रहेंगे.फिल्म का निर्देशन से लेकर सभी टेक्नीकल पक्ष बहुत शानदार है.सभी कलाकारों ने बहुत ही बेहतरीन अभिनय भी किया है और फिल्म के अंत में जो कार-चेस सिक्वेंस है, वो तो बहुत ही शानदार तरीके से शूट किया गया है…इस फिल्म का अंतिम कार-चेस दुनिया की बेहतरीन कार-चेस(फिल्मों में) में एक गिनी जायेगी..फिल्म में निकलस केज के अलावा एक और अभिनेता है जो मेरे पसंदीदा अभिनेता में से आते हैं.रॉबर्ट डुवाल, जिन्होंने फिल्म में ओट्टो का किरदार निभाया है.मेम्फिस रेन्स के बाद जिस किरदार ने मुझे ज्यादा प्रभावित किया था वो ओट्टो का ही किरदार था.

ये फिल्म दरअसल 1974 की हिट फिल्म ”गॉन इन सिक्सटी सेकण्ड” की री-मेक है.कहानी भी पुरानी फिल्म से इंस्पायर्ड है.पुरानी वाली फिल्म की कहानी एक इन्सुरेंस इन्वेस्टगेटर के ऊपर है जो की एक प्रोफेसनल कार चोर है.उसे एक काम मिलता है, 48 हाई इंड गाड़ियां चुराने का.और जिसे वो पूरा भी करता है.इस फिल्म ने निर्माता-निर्देशक-लेखक और अभिनेता थे मशहूर अमेरिकन कार स्टंट ड्राईवर एच.बी.हैलिकी.फिल्म में इस्तेमाल की गयी लगभग सभी गाड़ियां हैलिकी की ही थी और लगभग सभी कार-स्टंट खुद हैलिकी ने ही किया था.हैलिकी ने इस फिल्म के अलावा भी कुछ फ़िल्में बनायीं हैं जिनमे दो फ़िल्में थोड़ी मशहूर हुई थी..’द जंकमैन’, और ‘डेडलाईन ऑटो थेफ्ट’.हैलिकी अपनी फिल्म ”गॉन इन सिक्सटी सेकण्ड” का सिक्वेल बनाने के दौरान एक एक्सीडेंट के शिकार हुए और वहीँ उनकी मृत्यु हो गयी.डोमनिक सेना, जिन्होंने निकलस केज को लेकर ”गॉन इन सिक्सटी सेकण्ड” फिल्म बनायीं थी वो दरअसल अपने कैरिअर के शुरूआती दिनों में हैलिकी के सहायक थे, और उनसे डोमनिक के सम्बन्ध भी अच्छे थे..चुकि वो पहले भी हैलिकी के साथ काम कर चुके थे और उन्हें जानते थे शायद इसलिए जब मशहूर फिल्म निर्माता जेरी ब्रुखिमर ने हैलिकी की पत्नी से ”गॉन इन सिक्सटी सेकण्ड” का रिमेक बनाने का अधिकार खरीदा, तो उन्होंने डोमनिक सेना को फिल्म का डाइरेक्टर नियुक्त किया.

हैलिकी निर्देशित ”गॉन इन सिक्सटी सेकण्ड” फिल्म में खास बात ये थी की फोर्ड कंपनी की 1973 Mustang Mach I को उन्होंने एलेनोर नाम दिया था और ये पहली ऐसी गाड़ी थी जिसका नाम फिल्म के टाईटल कास्ट क्रेडिट में दिया गया था.डोमनिक सेना ने भी अपनी फिल्म में 1973 Shelby GT500 को एलेनोर नाम दिया.

कुछ लोगों का मानना है की पुरानी वाली फिल्म ज्यादा बेहतर थी नयी वाली फिल्म से.लेकिन मैं ऐसा बिलकुल नहीं मानता.इसमें कोई संदेह नहीं की हैलिकी ने एक इन्डिपेन्डन्ट कार थीम फिल्म बनाने की शानदार कोशिश की थी,और फिल्म हिट भी हुई थी लेकिन निर्देशन,अभिनय,स्क्रिप्ट और कई टेक्नीकल मामलों में ये फिल्म बेहद कमज़ोर थी.फिल्म में 40 मिनट का एक कार-चेस सिक्वेंस है(अब तक बनी फिल्मों में सबसे लंबा कार-चेस).इस कार चेस में लगभा 95 गाड़ियां बरबाद हुई थी.और सच पूछिए तो चालीस मिनट की चेस पुरे फिल्म की जान है.जो कारों की दिलचस्पी नहीं रखते उन्हें ये चालीस मिनट की कार-चेस भी बोरिंग लग सकती है.चालीस मिनट की कार चेस लेकिन वाकई शानदार है, और निश्चित तौर पे ये फिल्म की सबसे बड़ी यु.एस.पी है.

“गॉन इन सिक्सटी सेकण्ड” के अलावा एक और फिल्म जो मुझे बेहद पसंद है और जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया वो है “वैनिशिंग पॉइंट”.इस फिल्म को आप हार्डकोर कार फिल्म की श्रेणी में नहीं रख पायेंगे, बल्कि ये एक ‘रोड मूवी’ है.फिल्म की कहानी कोवाल्सकी के किरदार के ऊपर आधारित है जिसे ‘बैरी नुमेन” ने बहुत ही अच्छे से निभाया है.फिल्म की कहानी स्टेरीओटाइप ना होकर बिलकुल अलग सी है…कोवाल्सकी एक कार डिलीवरी एजेंट है जिसे एक गाड़ी (डॉज चैलेंजर R/T 440)सैन फ्रांसिस्को डिलीवर करनी है.वो अपने एक दोस्त से शर्त लगाता है की वो पन्द्रह घंटे में गाड़ी डिलीवर कर देगा, जबकि उसके पास समय काफी है.कोवाल्सकी जैसे अपने सफर पे बढ़ता है वैसे वैसे कुछ घटनाक्रम ऐसे होते हैं जो उसे अपने जिंदगी के बीते हुए दिन याद दिला जाते हैं, जो की उसके लिए सुखद नहीं थे..कोवाल्सकी ने अपने जीवन में जो भी हासिल किया था, सब वो खोते चला गया.वो एक अच्छा रेसर था, लेकिन दो जानलेवा एक्सीडेंट के वजह से उसे रेसिंग से बहार आना पड़ा.उसने फिर पुलिस में भी काम किया लेकिन एक सीनिअर ऑफिसर ने उसे ड्रग केस में फंसा कर पुलिस से बर्खास्त करवा दिया.कोवाल्सकी ने एक लड़की की इज्ज़त अपने सीनिअर ऑफिसर से बचायी थी, जिसका उसके सीनिअर ने बदला लिया..कोवाल्सकी अपने प्रेमिका की मृत्यु से भी काफी विचलित था..ये सब बातें उसके दिमाग में घूम रही थी..वो अपने सफर पे आगे बढ़ रहा था की एक दो छोटे हादसे के वजह से पुलिस  उसका पीछा करने लग गयी.वो रुका नहीं, और पुलिस को चकमा देकर गाड़ी भागता रहा..कोवाल्सकी ने कार रेडियो ऑन कर रखा था और था एक रेडियो स्टेशन KOW का रेडियो जॉकी(सुपर सोल) रेडियो की मदद से कोवाल्सकी की सहायता करने लगा..सुपर सोल की वजह से मिडिया में हर जगह कोवाल्सकी की चर्चा होने लगी और लोग कोवाल्सकी के समर्थन में बाहर सड़कों पे आ गए.सुपर सोल कोवाल्सकी को ‘द लास्ट अमेरिकन हीरो’ बुलाता है.फिल्म के आखिरी कुछ सीन में सुपर सोल ने कोवाल्सकी के लिए ये कहा : “..To whom speed means freedom of the soul. The question is not when’s he gonna stop, but who is gonna stop him..”

 

कोवाल्सकी को अंत में अपने जिंदगी की उलझनों से मुक्ति मिली या नहीं, ये जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी, लेकिन यकीन मानिए इस फिल्म को देखने के बाद आप कुछ देर तक तो कोवाल्सकी के बारे में जरूर सोचेंगे.और ये भी लगभग तय है की यदि कोवाल्सकी के किरदार ने आप पर कुछ असर किया हो तो आप ये फिल्म दुबारा देखने से भी खुद को रोक नहीं पायेंगे.निर्देशक रिचर्ड सफियन ने उम्दा काम किया है, फिल्म के अंतिम सीन में वो खुद भी कुछ पल के लिए स्क्रीन पर दिखे.
तीनों फिल्मों में अगर मुझसे पूछेंगे की सबसे बेहतरीन फिल्म कौन सी है तो मैं निश्चित तौर पे ‘”वैनिशिंग पॉइंट” का नाम लूँगा.ये अलग बात है की आज भी जब कोई मुझसे मेरी सबसे पसंदीदा अंग्रेजी फिल्म पूछता है तो मैं बिना रुके जवाब दे देता हूँ “गॉन इन सिक्सटी सेकण्ड”..जबकि मैंने बेहतरीन से बेहतरीन फ़िल्में भी देखी हैं, लेकिन ये फिल्म मेरे लिए कुछ खास है…आपने अभी तक अगर ये तीनो फ़िल्में नहीं देखी हैं तो जरूर  देखें…तीनो बेहतरीन फ़िल्में हैं.जिन्हें गाड़ियों में खास दिलचस्पी नहीं उसे हैलिकी निर्देशित फिल्म “गॉन इन सिक्सटी सेकण्ड” शायद पसंद नहीं आये, लेकिन बाकी दोनों फ़िल्में जरूर पसंद आएँगी.



अगले पोस्ट में जारी…
कुछ और बेहतरीन कार फिल्मों की बात चलेगी..

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  1. Sounds weird but Maine aaj tak yeh movie nhi dekhi!! Actually mujhe romantic type movis he pasand aati hai, actions bores me out..!

    Your post makes me want to see it. Will see it soon and let you know how I liked it 🙂

  2. कारों के प्रति आपकी दीवानगी स्वतः अभिव्यक्त है, सुन्दर विश्लेषण..

  3. क्या बात है…. आपका पैशन तो सच में कमाल है…..

  4. आपकी दीवानगी और इतनी रोचक और जानकारी भरी पोस्ट तैयार हो गई … और क्या चाहिए हमें …

  5. आपका जुनून काबिले तारीफ है चाहे वह क्रिकेट के लिए हो,कारों के लिए हो या फिर भगतसिंह,पाश के लिए। यह अब तक आपको जानकारी हो ही गई होगी कि पाश का पूरा नाम अवतारसिंह पाश है।

  6. वैसे इस फिल्म मे अंजिलिना जोली भी थी … अगर तुम्हारा ध्यान गया हो तो … 😉

    बढ़िया लिखा है … लगे रहो !

  7. एक बार अपने हाथों से एक फेरारी खरीदने के लिए पैसे भेजे थे मैंने अपने किसी क्लाएंट के लिए… सोचता हूँ (और शायद सोच ही सकता हूँ) कि अगर ऊपरवाले ने उस लायक बनाया तो तुम्हें फेरारी ज़रुर गिफ्ट करूँगा!!
    पोस्ट तो हमेशा की तरह "दिल से!!!"

  8. आपके ब्लाग पर हमेशा कुछ विशेष मिलता है । पाश की कविताएं मर्म छूने ही नही झिंझोडने वाली हैं । और कारों की बात पर मुझे छोटे बेटे मयंक की सनक भी याद आगई । जब हम कार तो क्या साइकिल खरीदने में भी कई बार सोचते थे ,वह जाने कितनी कारों के नाम ,उनकी विसेषताएं ,मूल्य जानता था और अपने बैग में तमाम कारों की तस्वीरें रखता था । और मुझे दिखाता रहता था । सचमुच सपनों का सजीव रहना सबसे ज्यादा जरूरी है ।

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