जिंदगी न मिलेगी दोबारा – अ मैजिकल फिल्म!!

इस फिल्म को रिलीज हुए लगभग २० दिन से ज्यादा हो गए हैं और अब तक ये भी साफ़ हो चूका है की रेडी के बाद इस साल की ये दूसरी सबसे बड़ी सफल फिल्म है..लेकिन मैंने अभी तीन दिन पहले ही ये फिल्म देखा..और फिल्म देखने के बाद बिना इसके बारे में लिखे रह नहीं सका, लिखा था दो दिन पहले ही, लेकिन आज पोस्ट कर रहा हूँ, फिल्म से जुड़ी पोस्ट लिखना मुझे आता नहीं, तो अगर कोई लंबा,बोरिंग और फ़ालतू लगे लगे तो प्लीज जस्ट इग्नोर दिस पोस्ट 😉

दिल चाहता है,रॉक ऑन,लक्ष्य,जिंदगी न मिलेगी दोबारा..इन चारों फिल्मों में दो बातें सामान्य है.पहली तो ये की ये चारों फ़िल्में फरहान अख्तर से जुड़ी हुई हैं और दूसरी ये की इन चारों फिल्मों के रिलीज होने से पहले मेरी राय इन फिल्मों के बारे में कुछ खास अच्छी नहीं थी और नाही मैं इन फिल्मों के रिलीज होने का इंतज़ार कर रहा था(यकीन मानिए कुछ फिल्मों के रिलीज होने का मैं बेसब्री से इंतज़ार करता हूँ).लेकिन फिल्म देखने के बाद ये चारों फिल्मों ने बहुत गहरा असर किया मेरे पे.फरहान अख्तर ने दोस्तों के ऊपर तीन फ़िल्में बनाई हैं -रॉक ऑन,दिल चाहता है और जिंदगी न मिलेगी दोबारा.और इन तीनों फिल्मों में तीन दोस्तों की कहानी है, शायद इसलिए भी मैं इन फिल्मों से ज्यादा रिलेट कर पाता हूँ खुद को, क्यूंकि तीन दोस्तों का ग्रुप मेरा हमेशा से रहा है.जैसे पटना में “मती,प्रभात और मैं” इंजीनियरिंग के दिनों में “अकरम,समित और मैं”.

संक्षिप्त कहानी –

जिंदगी न मिलेगी दोबारा फिल्म तीन दोस्तों के ऊपर आधारित है “कबीर(अभय देओल), अर्जुन(ह्रितिक रोशन) और इमरान(फरहान अख्तर)”.कबीर के परिवार का कंस्ट्रक्सन का बिजनेस है.इमरान एक बेफिक्र कॉपीराइटर है, साथ ही साथ वो शायरी भी करता है और अर्जुन एक वर्कअहालिक स्टॉकब्रोकर है जो की लन्दन में रहता है और जिसका एकमात्र उद्देश्य पैसा कमाना रहता है.इन तीनो दोस्तों ने अपने कॉलेज के दिनों में एक पैक्ट बनाया होता है की कोई भी अपनी मर्जी का कौन सा भी ऐड्वेन्चर स्पोर्ट्स चुन सकता है और बाकी दोनों को उस सपोर्ट में भाग लेना ही होगा.फिल्म की शुरूआत होती है – कबीर(अभय देओल) अपनी गर्लफ्रेंड नताशा(कल्कि कोच्लिन) को प्रपोज कर रहा है.कबीर शादी से पहले एक बैचलर रोड ट्रिप पे स्पेन जाना चाहता है(स्पेन जाने का असल में आईडिया इमरान का रहता है).

तीनो अपनी रोड ट्रिप बार्सीलोना से शुरू करते हैं.तीनों दोस्तों के रोड ट्रिप में कोस्टा ब्रावा,सेविला और पैम्प्लोना आते हैं.कोस्टा ब्रावा जहाँ कबीर की पसंद है, वहीँ सेविला अर्जुन की पसंद और पैम्प्लोना इमरान की पसंद है. अर्जुन और इमरान की कुछ खास बनती नही, हमेशा नोकझोंक होती रहती है,जिसकी वजह अर्जुन की एक्स गर्लफ्रेंड रहती थी.ट्रिप के शुरुआत में ही अर्जुन और इमरान में बड़ी तीखी पर मजेदार नोकझोंक होती है.तीनो के ट्रिप का पहला पड़ाव कोस्टा ब्रावा रहता है.कोस्टा ब्रावा बीच पे इनकी मुलाक़ात लैला(कैटरिना कैफ) से होती है(बाद में पता चलता है की लैला इन तीनो की डाईविंग इंस्ट्रक्टर रहती है).यहाँ कबीर यहाँ अपने चुने हुए ऐड्वेन्चर स्पोर्ट(स्कूबा डाइविंग) के बारे में इमरान और अर्जुन को बताता है.अर्जुन को स्विमिंग से डर लगता है, लेकिन लैला अर्जुन को अपने डर से लड़ने में मदद करती है.अर्जुन को पहली बार अहसास होता है की जिंदगी कितनी खूबसूरत है.अर्जुन को लैला से प्यार होने लगता है.तीनो दोस्त यहाँ से अपने आगे की यात्रा पे निकल जाते हैं.वो अपने ग्रुप में लैला को शामिल कर लेते हैं और ये तय करते हैं की लैला के साथ स्पेन के मशहूर तोमितिनो फेस्टीवल में भाग लेंगे.

इन तीनो का अगला पड़ाव रहता है सेविला,जो अर्जुन के पसंद का है और जहाँ से अर्जुन ने स्काई डाइविंग को अपना ऐड्वेन्चर स्पोर्ट् चुना है.इस बार इमरान को अपने डर का सामना करना होता है, उसे ऊँचाई से डर लगता है.सेविला में एक बार में तीनो दोस्त एक अनजान के साथ थोड़ी शरारत करने के क्रम में इन्हें जेल जाना पड़ता है.जेल में इमरान दोनों दोस्तों को बताता है की सलमान हबीब(नसीरुद्दीन शाह ) जो वहीँ रहते हैं और एक आर्टिस्ट हैं, उसके असली पिता हैं.जेल से इमरान अपने असली पिता सलमान को फोन करता है, और बाद में सलमान ही उनकी ज़मानत दे उन्हें जेल से निकलवाते है.

सेविला से तीनो अपने आगे के सफर के लिए पैम्प्लोना निकल जाते हैं.यहाँ अर्जुन और इमरान को ये पता चलता है की कबीर अभी शादी के लिए तैयार नहीं है और नताशा को प्रपोज एक ऐक्सिडेन्टल प्रपोज था.इमरान और अर्जुन कबीर से कहते हैं की वो इस शादी से इनकार कर दे, लेकिन कबीर नहीं चाहता इनकार करना क्यूंकि दोनों के परिवार वाले भी इस सम्बन्ध से बहुत खुश हैं और वो दोनों परिवार और नताशा को दुःख पहुँचाना नहीं चाहता.
पैम्प्लोना इमरान के पसंद की जगह थी और यहाँ उसने अपने पसंद का  ऐड्वेन्चर स्पोर्ट चुना था-बुल रन.बुल चेस से पहले इमरान चाहता है की तीनो एक दूसरे से कुछ वादा करें, की अगर वो जिंदा बच गए तो क्या करेंगे.इमरान वादा करता है की अगर वो जिंदा बच गया तो वो अपनी कविताओं को पब्लिश करवाएगा.अर्जुन वादा करता है की अगर वो जिंदा बच गया तो वो लैला के साथ मोरोक्को जाएगा.वहीँ कबीर ये वादा करता है की अगर वो जिंदा बच गया तो वो नताशा से कहेगा की वो अभी शादी के लिए तैयार नहीं है.

जिंदगी न मिलेगी दोबारा तीनों दोस्तों के बारे में है जिनके जिंदगी में कुछ न कुछ दिक्कतें हैं, कुछ न कुछ परेशानियाँ हैं जो धीरे धीरे ट्रिप में एक एक कर के सामने आती है और एक एक कर के सुलझते भी जाती है.ये इन तीनों के लिए एक ऐसा ट्रिप होता है जो इनकी जिंदगी बदल देता है.अर्जुन को लैला से मिलने पर पहली बार ये अहसास होता है की जिंदगी सिर्फ पैसे कमाने के लिए,बंध के जीने के लिए नहीं है,खुल के जीने के लिए है..अपने आज में जीना चाहिए.वहीँ इमरान को ऊँचाई से डर लगता है लेकिन स्काई डाइविंग के बाद उसे पहली बार अहसास होता है की वो अपने अंदर के डर को खत्म कर आज़ाद हो सकता है.इमरान पुरे ट्रिप में दो बार सलमान से मिलने की कोशिश की, लेकिन एक अनजाने डर के कारण वो मिलने से डरता रहा.स्काई डाईविंग के बाद उसे अपने डर से जीतने की शक्ति मिली, और इसलिए शायद वो सलमान से मिल पाया, अपने अंदर छुपे कई सवाल के जवाब ढूँढ सका.वहीँ कबीर के लिए ये ट्रिप जरुरी थी क्यूंकि वो अपने दिल की बात अपने इन दो दोस्तों के सिवा किसी को कह नहीं सकता था.

जिंदगी न मिलेगी दोबारा एक बहुत ही सीधी सादी फिल्म है बिना कोई ट्विस्ट एंड टर्न स्टोरी के.लेकिन फिल्म का निर्देशन गज़ब का किया है जोया अख्तर ने.बहुत ही खूबसूरती से फिल्म को शोट किया गया है.फिल्म के कितने ही ऐसे सीन हैं जहाँ आप खुद को रिलेट कर सकते हैं(औरों की बात तो मैं नहीं जानता, मैंने खुद को कई जगह फिल्म से रिलेट किया).कबीर के पैतरें और प्रैंक्स भी फिल्म में इतने अच्छे से फिल्माए गए हैं, की आपको लगेगा की आप भी उन सब प्रैंक्स का एक हिस्सा हैं.फिर वो चाहे अपने कॉलेज के प्रोफ़ेसर के ऐक्सेन्ट की नक़ल कर बोलना हो या फिर खट्टी-मीठी नोकझोंक..फिल्म में कितने ही ऐसे पल देखने को मिलेंगे जहाँ ये लग सकता है की ऐसा कुछ कभी मेरे साथ हो चूका है या फिर ऐसी ही कोई मस्ती या हरकतें हमने भी अपने दोस्तों के साथ की है.कितने ही ऐसे पल हैं फिल्म में जिसे देख के चेहरे पे एक मुस्कराहट, एक हंसी आती है..और कुछ ऐसे पल भी हैं जिसे देख कुछ पुरानी बीती बात याद आती है.फिल्म के डायलोग जो भी हैं, उन्हें डायलोग न कह कर एक सिम्पल बातचीत कही जाए तो ज्यादा सही होगा.पूरी फिल्म में ऐसा कहीं नहीं लगेगा की एक्टर्स डायलोग बोल रहे हैं, ऐसा लगता है की जैसे कुछ दोस्त आपस में बातें कर रहे हैं..चाहे फिल्म का वो सीन हो जहाँ इमरान अपनी माँ से कहता है – दिल्ली और अकेले रहना, मुझे दोनों पसंद है या फिर अर्जुन-लैला की वो बातचीत जहाँ अर्जुन कहता है लैला से : “मेरी जिंदगी तो जैसे एक बंद बक्से में कट रही है” और लैला बड़ी ही सहजता से कहती है “बंद बक्से में तो इंसान को बस मरने के बाद ही रहना चाहिए”.हर डायलोग काफी नैचुरल हैं फिल्म के, और उसे उतनी ही खूबसूरती के साथ दिखाया भी गया है.फिल्म के डायलोग फरहान अख्तर ने लिखे हैं.

फिल्म के कुछ दृश्य छोड़ दी जाए तो पूरी फिल्म स्पेन में शूट की गयी है.सिनिमटोग्रफर कार्लोस काटलान ने बहुत ही खूबसूरती के साथ स्पेन को परदे पे दिखाया है.इतनी बेहतरीन सिनिमटोग्राफी आमतौर पे बहुत ही कम देखने को मिलती हैं आजकल के फिल्मों में.मैं स्पेन के दृश्यों को देख के खो सा गया था.तीनो दोस्तों के ऐड्वेन्चर स्पोर्ट्स को भी इतनी खूबसूरती के साथ दिखाया गया है की आप भी रोमांचित हुए बिना नहीं रह सकेंगे.आमतौर पे मैं नए फिल्मों के गाने नहीं सुनता, इस फिल्म के भी गाने मैंने पहले कहीं भी नहीं सुने थे..लेकिन फिल्म देखने के बाद गानों ने अपना असर छोड़ा मेरे पे.खास कर के “ख्वाबों के परिंदे” और “सेन्योरीटा” का संगीत मुझे बेहद पसंद आया.जोया अख्तर ने बेहतरीन निर्देशन किया है फिल्म का.और सभी कलाकारों ने शानदार अभिनय.अभय देओल,ह्रितिक रोशन,फरहान अख्तर तीनो ने बेहतरीन अभिनय किया है.तीनो कलाकारों के बीच की जो बोन्डिंग है वो इतनी शानदार है की ऐसा कभी लगता ही नहीं तीन अभिनेता स्क्रीन पे हैं, लगता है की जैसे तीन दोस्त आपस में बात और कुछ नौटंकियां कर रहे हैं.कैटरिना कैफ ने भी बहुत ही सहज और अच्छा अभिनय किया है.

 

मैं इस फिल्म के साथ आसानी से रिलेट शायद इसलिए भी कर सकता हूँ की ऐसे ही किसी रोड ट्रिप पे जाने की इच्छा मेरी भी है अपने दो दोस्त समित और अकरम के साथ.चूँकि एक ऐसा ही रोड ट्रिप मैंने अपने कॉलेज के दिनों में मिस कर दिया था, इसलिए भी उनके साथ कहीं किसी ट्रिप पे जाने की ईच्छा है.हमने कई बार प्लांनिग भी की लेकिन कुछ न कुछ कारण से वो प्लान अटकता रहा.दूसरी बात ये की फिल्म में कई ऐसे पल हैं जिससे मैं और अकरम बहुत आसानी से रिलेट कर सकते हैं.इस फिल्म में इमरान के कारों की प्रति दीवानगी भी गज़ब की है, और तो और मेरी पसंदीदा कार “कैडिलैक” भी है इस फिल्म में ;).
कवितायें –
    फिल्म में सबसे मजाकिया और हंसाने वाला किरदार इमरान का है..इमरान के बातों से चेहरे पे हंसी आएगी, मुस्कराहट आएगी..उसके प्रैंक्स और अजीब ऐक्सेन्ट फिल्म में हमें बड़ी आसानी से गुदगुदाते हैं, लेकिन वहीँ एक गंभीर पहलु भी है इमरान का, उसके अंदर कई सवाल हैं जिसका जवाब उसे सलमान हबीब से मिलने पर मिलता है..और इसी गंभीर पहलु का एक हिस्सा है इमरान की पोएट्री.फिल्म में ये कवितायें जगह जगह हैं..
1.जब अर्जुन स्कूबा डाईविंग कर पानी से बाहर निकलता है, तो उसके आँखों में अनायास ही आँसू आ जाते हैं, वो भी नहीं समझ पाता की ऐसा क्यों हुआ है.उस वक्त इमरान ये कविता सोचता है और बहुत हद तक अर्जुन के  दिलो-दिमाग में भी यही बात चलते रहती है –
       पिघले नीलम सा बहता हुआ ये समां
       नीली नीली सी खामोशियाँ
       न कहीं है ज़मीन, न कहीं आसमान
       सरसराती हुई टहनियाँ, पत्तियां
       कह रहीं हैं की बस एक तुम हो यहाँ..
       सिर्फ मैं हूँ..मेरी साँसें हैं..मेरी धड़कने
       ऐसी गहराइयाँ, ऐसी तन्हाइयां,
       और मैं… सिर्फ मैं..
       अपने होने पे मुझको यकीन आ गया..
2.जब तीनो दोस्त बुन्यल से सेविला के लिए निकलते हैं,और अर्जुन-लैला जब बिछड़ रहे होते हैं तब इमरान के दिल से ये बात निकलती है जो अर्जुन के दिल की बात भी होती है.
     एक बात होटों तक है जो आई नहीं
     बस आँखों से है झांकती
     तुमसे कभी मुझसे कभी
     कुछ लब्ज है वो मांगती
     जिनको पहन के होटों तक आ जाए वो
     आवाज़ की बाहों में बाहें डाल के इठलाये वो
     लेकिन जो ये एक बात है एहसास ही एहसास है
     खुशबु सी जैसे हवा में है तैरती
     खुशबु जो बेआवाज़ है
     जिसका पता तुमको भी है, जिसकी खबर मुझको भी है
     दुनिया से भी छुपता नहीं, ये जाने कैसा राज है
3.जब इमरान सलमान हबीब से मिलकर वापस लौटता है और जब उसके अंदर छुपे कई सवालों के कटु जवाब उसे मिल जाते हैं, तब उसका दिल ये कहता है –
      जब जब दर्द का बादल छाया, जब गम का साया लहराया
      जब आँसू पलकों तक आया, जब ये तनहा दिल घबराया
      हमने दिल को ये समझाया, दिल आखिर तू क्यों रोता है..
      दुनिया में युही होता है..
     ये जो गहरे सन्नाटे हैं..वक्त ने सब को ही बांटे हैं
      थोडा गम है सबका किस्सा..थोड़ी धुप है सब का हिस्सा
     आँख तेरी बेकार ही नम है, हर पल एक नया मौसम है
     क्यूँ तू ऐसे पल खोता है..दिल आखिर तू क्यूँ रोता है..
4.बुल-रेस में जब तीनो दोस्त आख़िरकार सही सलामत बच जाते हैं तो इमरान की ये कविता आती है सामने –
       दिलो में तुम अपनी बेताबियाँ लेके चल रहे हो तो जिंदा हो तुम..
       नज़र में ख्वाबों की बिजलियाँ लेके चल रहे हो तो जिंदा हो तुम..
       हवा के झोकों के जैसे आज़ाद रहना सीखो
       तुम एक दरिया के जैसे लहरों में बहना सीखो..
       हर एक लम्हें से तुम मिलो खोले अपनी बाहें
       हर एक पल एक नया समां देखे ये निगाहें..
       जो अपनी आखों में हैरानियाँ लेके चल रहे हो तो जिंदा हो तुम..
       दिलो में तुम अपनी बेताबियाँ लेके चल रहे हो तो जिंदा हो तुम..
             (चारों कवितायें जावेद अख्तर ने लिखी हैं).
ये फिल्म आपको अपने अच्छे दोस्तों की याद दिलाएगी, और आप चाहेंगे की इमरान,कबीर और अर्जुन के तरह ही आप भी कहीं किसी ऐसे ही ट्रिप पे जाएँ..और यदि आपका वो अच्छा दोस्त आपसे दूर कहीं है तब तो ये फिल्म आपपे कहर ढा सकती है जनाब.

 

 

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  1. चलो भाई, अब इस फ़िल्म में कुछ घूमने के बारे में है तो इसे देख ही लेते है।

  2. रघुवीर सहाय जी की भी कुछ पंक्तियां थीं न, याद हैं क्या कौन सी थीं? आजकल की किसी मॉड हिंदी फ़िल्म में एक हिंदी कवि का नाम सुनना (जावेद, गुलज़ार, बच्चन साहेब और कुछेक शायरों के अलावा) एक अलग अनुभूति है…

    फ़िल्म अच्छी थी लेकिन और अच्छी बनायी जा सकती थी। कुछेक सीन्स जबरदस्ती डाले हुए लगते हैं। सेनोरिटा गाना जबरदस्ती डाला हुआ लगता है, उसे लास्ट में नंबरिग के साथ दिखा सकते थे। तीनों की दोस्ती में भी कोई कोलाज नहीं दिखा.. कॉलेज की और बातें आ सकती थीं.. थोडी और दोस्ती आ सकती थी। फ़िर भी फ़रहान के लिखी लाईन्स अच्छी लगीं खासकर स्विमिंग और साँसों से रिलेटेड… स्पेन भी खूबसूरत लगा लेकिन शायद वो भी उतना वास्तविक नहीं लगा जितना होता होगा…
    अच्छा लिखा है अभी और सबसे बडी बात कि मन से लिखा है 🙂

  3. बढ़िया लिखा … वाकई फिल्म बहुत अच्छी है

  4. बस इन कविताओं के लिये देखी जायेगी यह फिल्म।

  5. Yeh film last week dekhi humne. Spain bahut khoobsurat laga. Lekin movie bahut slow lagi. Uper se ek baat jo hajam nahi hoti aajkal ki hindi movies dekhke, wo yeh ki why do they have to show our youth trying to copy the American humor ? Its feel very forced. Doston ke beechki hasi majak mein bilkul bhi chemistry nahi thi. Felt like Abhay deol and FArhan's character should have been interchanged. Farhan needed the serious role and Abhay could be the baby of the group.

  6. @रीना..
    एकदम मन की बात कही आपने…मैं फिल्म देखते वक्त ये सोच रहा था की फरहान अख्तर को अगर ह्रितिक का रोल मिलता तो वो एकदम फिट बैठता लेकिन ह्रितिक ने भी उस रोल में मस्त काम किया है…और अभय के लिए ये रोल परफेक्ट था, हाँ वो फरहान वाला पार्ट भी बहुत अच्छे से निभा सकता था..

    @पंकज..
    हाँ सही कहा…ये मैं भी मानता हूँ की सेनोरीटा वाले गाने की वहां कोई खास जरूरत नहीं थी….लेकिन फिर भी जैसा मैंने लिखा है की कुछ ऐसी बातें हैं इस फिल्म में जिससे मैं और मेरा दोस्त अकरम काफी आसानी से रिलेट कर सकते हैं…जब मिलूँगा तो फूल डिटेल में बताऊंगा 🙂 🙂

  7. @रीना
    अच्छा लगा की अब आप भी ब्लॉग के रंग में रंग रहीं हैं…ब्लॉग लिखना और टिपण्णी करना दोनों आपने शुरू कर दिया…गुड!! 🙂

  8. बहुत अच्छी विस्तृत समीक्षा ….. अब फिल्म देखनी ही होगी…..

  9. अभी,
    इस फिल्म पर अब तक अपनी प्रतिक्रिया देने से बचती रही….फेसबुक पर लोगो के स्टेटस देखे…पर रोक लिया खुद को..कुछ कहने से..क्यूंकि सब इतनी तारीफ़ कर रहे हैं…तो सोचा…उन्हें उनके खुशनुमा अहसास के दरम्यान ही रहने दिया जाए.
    पर यहाँ तो कुछ लिखना लाज़मी है…मुझे फिल्म बस ठीक सी ही लगी…हृतिक और फरहान बिलकुल अपने रोल में नहीं जंचे…दोनों ने पूरा न्याय किया उस रोल के साथ…पर चेहरे पर झलकती उम्र का क्या करें..कहीं से भी वे एक युवक नहीं लग रहे थे…और उन्हें जो डायलौग दिए गए थे थोड़े से forced लग रहे थे…spontaneous नहीं….जैसा कि रीना ने कहा….मुझे फिल्म कुछ स्लो भी लगी…हाँ अभय, कैटरीना.कल्कि…अपने रोल के अनुकूल थे….कैटरीना तो पहली बार इतनी अच्छी लगी…

    पूरे समय मेरे दिमाग में साथ में'दिल चाहता है' फिल्म चलती रही…उसमे सबकुछ कितना सहज था…'लक्ष्य, 'रॉक ऑन'भी मेरी पसंदीदा फिल्म है…पर शायद ZNMD के लिए ये ना कह सकूँ.

    पर तुमने लिखा बहुत अच्छा है…फिल्म देखते हुए अपने अनुभवों को भी रखा…वो बहुत अच्छा लगा…
    नज़्म की वो पंक्तियाँ शेयर करने का शुक्रिया…मुझे तो बस यही याद रहा था…

    तू नहीं,तेरा गम,तेरी जुस्तजू भी नही
    गुज़र रही है,कुछ इस तरह जिंदगी
    जैसे इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं

  10. भई सही कहें तो बहुत दिनों बाद एक अच्‍छी फिल्‍म देखने को मिली। और अपने को तो सभी का अभिनय अच्‍छा लगा। यह भी लगा कि जिसने जो रोल निभाया वह उसको दिमाग में रखकर ही लिखा गया था। कहानी को बहुत फैलाया नहीं है। बल्कि अगर ध्‍यान से देखें तो किसी लोककथा या पुरानी कथा की तर्ज पर कहानी लिखी गई है। पुरानी कहानियों में इसी तरह की फंतासियां होती हैं जब उनमें कुछ अजीब अजीब जगहों,जंगलों या पहाड़ों पर जाकर किसी शर्त को पूरा करना होता है।
    *
    आपने इतने विस्‍तार से समीक्षा की, पसंद आई।

  11. फिल्म जब रिलीज़ हुई तब ही देखी थी…समीक्षा कहूँ या तुम्हारे अहसास…वो आज पढ़ा तो फिल्म फिर से याद आ गई…| फिल्म की सबसे अच्छी बात हमे जो लगी, वो इसका एक्चुअल कांसेप्ट…जी लो ये ज़िंदगी…जैसे चाहो…क्योंकि ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा…| प्रैंक्स बहुत एन्जॉय किए…और वो दृश्य…जब फरहान हृतिक का फोन फ़ेंक देता है…|
    कुल मिला कर फिल्म उतनी ही अचछी लगी, जितनी तुम्हारी ये पोस्ट…| दिल क्यों रोता है…और ज़िंदा हो तुम…हमको भी बहुत पसंद है…पर यूँ याद नहीं…|
    और हाँ…ज़रा शुरुआत का अपना कथन एडिट कर लो…तो बेहतर…:) 😛
    कारण तुमको पता ही है…:P

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