रसिया व् स्पोमिन्नानियाख – स्मृतियों में रूस

‘स्मृतियों में रूस’ को लेकर मैं बहुत पहले से काफी उत्साहित था.शायद आजतक मैं किसी भी किताब को लेकर इतना उत्साहित कभी नहीं रहा.इसकी वजह भी थी.जब से शिखा दी ने इस किताब की प्लानिंग की तब से ही मैं भी इस किताब से थोडा बहुत जुड़ा रहा.शिखा दी से जब भी बात होती तो इस किताब के बारे में बताते रहतीं.लन्दन के भारतीय उच्चायोग के तरफ से जब इन्हें अनुदान मिला था तब मैंने अपने एक दो करीबी दोस्तों को बड़े गर्व से इनकी तस्वीर दिखाई, ये कह कर की इन्हें सम्मान मिला है इनके आने वाली पुस्तक के लिए और ये मेरी बड़ी बहन हैं.उन दोस्तों के मुहं खुले के खुले रह गए.उनकी पहली प्रतिक्रिया ये थी की इतने बड़े बड़े लोगों से तुम्हारे पारिवारिक सम्बन्ध है.वैसे शिखा दी के बारे में मेरी भी पहली प्रतिक्रिया यही थी की ये बड़ी ‘हॉट-शॉट इंटरनेशनल लेखिका’ हैं.जब इनके ब्लॉग स्पन्दन पर मैं पहली बार गया था तब कुछ खास और विशेष कारणों से मैं इनके तरफ काफी आकर्षित हुआ.और जब इन्होने मेरे ब्लॉग पे पहला कमेन्ट किया था तब  मुझे बहुत खुशी भी हुई थी.

‘स्मृतियों में रूस’ जब से प्रकाशित हुई थी तब से ही मैं इसे पढ़ने के लिए बेताब था.तय किया की जब दिल्ली जाऊँगा तभी किताब भी खरीदूंगा.किताब लेने के लिए मुझे डाइमंड पब्लिकेशन के ऑफिस जाना था जो की दिल्ली के ओखला इलाके में है.ओखला मेट्रो स्टेशन से लेकर डाइमंड पब्लिकेशन के कार्यालय तक की जो सड़क है उसके बारे में ना ही पूछिए तो बेहतर है.ऑटो में हिलते-डुलते, बड़ा संघर्ष करते मैं पहुंचा डाइमंड बुक्स के ऑफिस.लेकिन किताब हाथ में लेने से ही बड़ा सुकून मिला.ये मेरे लिए पहला अवसर था जब मैं कोई ऐसी किताब खरीद रहा था जिसके लेखिका को मैं अच्छे से जानता था.किताब हाथ में आने के बाद खुद पे काबू कर पाना थोडा मुश्किल था.मेट्रो की अच्छी खासी भीड़ में मैं खड़े खड़े किताब पढ़ रहा था.आसपास के कुछ लोग कभी मुझे देखते तो कभी किताब को देखते.

भारतीय उच्चायोग के तरफ से सम्मान-पत्र लेते हुए

किसी भी लेखक या लेखिका को अगर आप करीब से जानते हैं तो किताब पढ़ने का मजा दुगुना हो जाता है. ‘स्मृतियों में रूस’ की अधिकतर बातें मुझे पहले से मालुम थी, और इस वजह से भी किताब पढ़ने में एक अलग ही आनंद आया.चित्र भी किताब में वही सब थे जो मैं पहले देख चूका था.ऐसे में किताब को पढ़ना बड़ा सुखद लग रहा था.मुझे कई कारणों से ये किताब पसंद आई.इस किताब को पढते हुए मुझे अपने कॉलेज के कितने ही अच्छे मोमेंट्स याद आयें.घर से दूर रह कर पढ़ाई कर रहे लगभग सभी लड़के-लड़कियों के मौज-मस्ती के पल एक से ही होते हैं.शिखा दी की इस किताब में आपको कितने ही ऐसे मस्ती के पल मिल जायेंगे जिससे आप पूरी तरह रिलेट कर सकेंगे.किताब में कई जगह शिखा दी का वो ‘किडीश नेचर’ दीखता है जो अबतक इनमे बरक़रार है.किताब में कितने ही जगह इनके बदमाशी के सबूत भी मौजूद हैं.खुद तो घर से इतने दूर रह कर ये छुप छुप कर घंटों आंसू बहाती थीं और बाहर आकार उन लड़कों पर ठहाके लगाकर हँसती थी जो पंकज उधास की ग़ज़ल ‘चिट्ठी आई है’ पुरे जोर से बजाते थे और उसे सुन सुन कर टेसुए बहाया करते थे.

खास कर लड़कों के लिए इस किताब में बड़े ज्ञान की बात लिखी हुई है.शिखा दी लिखती हैं की रूस की लड़कियां दुनिया की सबसे खूबसूरत होती हैं, और उन्हें भारतीय लड़के बड़े आसानी से एकाध टी-सर्ट देकर पटा लिया करते थे जिनसे लड़कों के कई काम आसान हो जाया करते थे.उन दिनों रूस में हिंदी फिल्म अभिनेताओं का बड़ा क्रेज था, और रूस की लड़कियां सारे हिन्दुस्तानी मर्दों को वैसा ही फ़िल्मी हीरो समझती थी, जिनमे सभी गुण होते हैं.शिखा दी ने इस किताब में ये भी माना और लिखा है की ‘दुनिया की कोई भी लड़कियां हों, वो इमोशनल फूल होती ही हैं’.

मस्ती के इतने अनमोल पल हैं इस किताब की सभी को लिखना यहाँ संभव नहीं है.रात भर पार्टी करना, नाचना गाना और फिर दिन भर सोना और फिर क्लास में जाकर रोना, ये लगभग हर स्टूडेंट लाईफ का एक हिस्सा है, और ऐसे अनगिनत पलों को इस किताब में बड़े अच्छे से सहेजा गया है.रूस के लोग संगीत और नृत्य के भी बेहद शौक़ीन होते हैं.बैले और ओपेरा से सम्बंधित छोटी छोटी बातों को भी बड़ी खूबसूरती के साथ इस किताब में लिखा गया है.मैंने कभी बैले या ओपेरा देखा नहीं, लेकिन किताब पढ़ने के बाद इन कार्यक्रम की खूबसूरती को महसूस कर सकता हूँ.रूस के व्यंजनों के बारे में भी इस किताब में इन्होने अच्छे से लिखा है.एक पूरा चैप्टर तो समोवार(एक खास तरह का कलात्मक रुसी जग जिसमे चाय भरी होती है) को ही समर्पित है.इस किताब के जरिये ही मुझे पता चला की रूस में चाय को ‘चाय’ ही बोलते हैं, और वहाँ के लोग भी चाय के बड़े शौक़ीन होते हैं.रूस के विभिन्न दर्शनीय स्थलों के बारे में भी इस किताब में शिखा दी ने बड़े अच्छे से बताया है.रूस का सबसे प्राचीनतम नगर कीव की सुंदरता हो या पुश्किन और गोर्की के खूबसूरत गाँव, सभी के बारे में अच्छी और खूबसूरत जानकारियां मौजूद हैं किताब में.

लेकिन सिर्फ मस्ती और घूमने-फिरने की ही बातें नहीं हैं इस किताब में.शिखा दी रूस तब गयीं जब रूस में कई राजनितिक और सामजिक बदलाव हो रहे थे.किताब पढ़ने से पता चलता है की शिखा दी ने कितनी सूक्षमता से रूस की बदलती स्तिथि को देखा और महसूस किया है.यह किताब रूस के प्रति शिखा दी के भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाता है.रूस के बारे में सभी बातें बिलकुल दिल से लिखी गयी हैं.शिखा दी लिखती हैं की ‘बहुत कुछ झेला है रूस ने’, वो कई उदाहरण भी देती हैं.कुछ कुछ ऐसी बातें भी हैं रूस के बारे में जो आपके रोंगटे खड़े कर देंगे.चाहे वो माँ-बेटी की छोटी सी कहानी हो या फिर नाज़ियों के हमले का समय जब सेंट पीटर्सबर्ग में इतनी बर्फ़बारी हुई की सारी फसलें बर्बाद हो गयीं, और दूसरी तरफ नाजी के हमले थे.भुखमरी ऐसी भीषण थी की लोग अपने बदन को छील कर उसका मांस भी खाना शुरू कर देते.बर्फ पिघली तो कितनी ही क्षत-विक्षत लाशें मिली जिनके जाँघों और बाहों का मांस कटा हुआ था.

इस किताब के जरिये रूस के बदलते सामजिक परिस्थितियों के बारे में कई सारी बातें पता चलती हैं.शिखा दी को भी इस बदलती परिस्थिति का सामना करना पड़ा.इन्हें आगे की पढ़ाई करने के लिए रशिया की सर्वश्रेष्ट यूनिवर्सिटी ‘मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी’ में भेजा गया.लेकिन रूस के आर्थिक और सामजिक बदलाव के कारण यूनिवर्सिटी ने बिना फीस दिए दाखिला देने से मना कर दिया.दाखिला न मिलने पर हॉस्टल की सुविधा भी इन्हें नहीं मिल पायी.अधिकतर लोगों ने अलग अलग जगहों पर अपना जुगाड़ कर लिया था.इन्हें और इनके कुछ दोस्तों को कहीं पनाह नहीं मिली और इन्होने अपना डेरा ट्रेन स्टेशन की बेंच पर डाल दिया.कुछ दिन इन्हें संघर्ष करना पड़ा और अच्छी खासी मशक्कत के बाद इन्हें मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी ने आख़िरकार अपना लिया. अक्सर अच्छे किताबों में कई सारी ऐसी बातें होती हैं जिन्हें आप दोबारा तिबारा पढते हैं, और दिल को बहुत अच्छा लगता है.शिखा दी की कही एक ऐसी ही बात सुनिए खुद उन्ही के शब्दों में, जो मुझे काफी अच्छी लगी –
“मॉस्को विश्वविद्यालय की आलिशान और बेहद लंबी ईमारत के गेट पर खड़े होकर एक बार उसे निहारा और सोचा की इंसान को सपने जरूर देखने चाहिए तभी उसके पुरे होने की उम्मीद की जा सकती है.एक साल पहले ठीक इसी जगह खड़े होकर इन आँखों ने सपना देखा था की काश! यह मेरा भी अध्यन स्थल हो जाता.आज वह सपना हकीकत बन सामने खड़ा था.”

एक सुखद बात जो मुझे इस किताब के जरिये पता चली वो थी रुशियों का हिंदी-प्रेम.रुसी विद्यार्थियों में हिंदी-भाषा के प्रति ऐसा आकर्षण था की वो अक्सर हिंदी भाषा के भविष्य को लेकर चर्चा करते थे.ये बात जानना मेरे लिए और अन्य भारतीयों के लिए बहुत सुखद है.हमारे देश में आजकल जहाँ एक तरफ लोग हिंदी भाषा से कतराते हैं वहीँ रूसियों का हिंदी के प्रति लगाव के बारे में पढ़ना सच में अच्छा लगता है और अपने भाषा पर गर्व भी होता है.

रूस के बारे में पढ़ना मुझे हमेशा अच्छा लगता है, शायद यही वजह भी थी की कुछ साल पहले आई एक फिल्म ‘लकी’ मुझे पसंद आई थी.उस फिल्म में रूस को बड़े खूबसूरती के साथ दिखाया गया था.शिखा दी की इस किताब को पढ़ना मुझे इसलिए भी अच्छा लगा क्यूंकि रूस के बारे में इन्होने बहुत खूबसूरती से बताया है.शिखा दी लिखती हैं किताब में की रूस एक अनोखा देश है.किताब पढते पढते मुझे तो ये अनोखा के साथ साथ जादू वाला देश भी लगने लगा.ये रूस का जादू ही कहियेगा न की एक सोलह साल की कमसिन लड़की को यहाँ आते ही एक ‘बोल्ड-गर्ल’ का खिताब मिल गया और अंत में ये ‘बोल्ड गर्ल’ इतनी बोल्ड हो गयी की अपना हक भी छीन कर ही दम लिया.

माक्सिम गोर्की का घर

ये किताब पढ़ना मेरे लिए एक सुखद अनुभव रहा, और बाकी लोगों के लिए भी निश्चित तौर पे इस किताब को पढ़ना एक सुखद अनुभव रहेगा.कल शाम तो जाने-अनजाने में मैंने इस किताब की थोड़ी बहुत मार्केटिंग भी कर दी.जिस स्नैक्स पॉइंट में मैं हर शाम बैठता हूँ वहाँ कल कुछ कॉलेज के लड़के-लड़कियां भी बैठी हुई थी, जब एक लड़के ने मेरे हाथ में ये किताब देखा तो उसे उत्सुकता हुई और मुझसे उसने किताब के बारे में पूछा.उसे मैंने किताब के बारे में, लेखिका के बारे में बताया तो उसे भी किताब खरीदने की उत्सुकता हुई.वो लड़का ग्वालिअर से था और उसने जाते जाते मुझसे कहा की वो इस किताब को ओनलाईन खरीद कर पढ़ेगा.

चलते चलते इस किताब से शिखा दी की एक कविता –

यादों की सतह पर चढ़ गयी हैं 
वक्त की कितनी ही परतें
फिर भी कहीं न कहीं से निकलकर
दस्तक दे जाती हैं यादें 
और मैं मजबूर हो जाती हूँ 
खोलने को कपाट मन के 
फिर निकल पड़ते हैं उद्गार
और बिखर जाते हैं कागज़ पे
सच है
गुज़रा वक्त लौट कर नहीं आता 
पर क्या कभी भुला भी जाता है?
कहीं किसी मोड़ पर मिल ही जाता है.

आप इस किताब को जरूर पढ़े और आज ही आर्डर करें.आप किताब पढ़ कर निराश नहीं होंगे, इसकी गारंटी मैं देता हूँ…किताब खरीदने के लिए इस लिंक पर जाएँ-


‘स्मृतियों में रूस ओनलाईन खरीदें’

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  1. कल मिली ये किताब और और मेट्रो के पौने दो घंटे के सफर में समाप्त!! लिखता हूँ इसके बारे में.. मगर तुम्हारे लेखन की बात ही कुछ और है.. इसका मुकाबला करना मेरे बस में नहीं!!

  2. बचपन में हिंदी की किताब में एक कहानी पढी थी जिसमें एक भारतीय परिवार के अनुभव पढे थे जाने किस देश में प्रवास का था ये याद नहीं ,मगर वो पाठ याद हो आया अचानक ही ।इस किताब को तो अब हम भी पढेंगें चाहे तुमसे ही झटक के पढना पडे

  3. अभि ! तुमने जो "यहाँ" कहा और जो "यहाँ नहीं कहा " 🙂 उसके बाद तो मेरे लिए कुछ भी कहना संभव ही नहीं रह गया है.

  4. सुन्दर संस्मरण पुस्तक की सटीक समीक्षा ..

  5. आपने इतनी सुन्दरता से बताया है कि उत्सुकता तो सचमुच बढ़ गयी है पुस्तक पढ़ने की…
    यहाँ स्वीडन में कुछ रुसी दोस्त हैं मेरे… किताब मिले तो पढ़ कर इसकी चर्चा उनसे अवश्य करेंगे!

  6. बचपन स्ही एक विशेष आकर्षण रहा है रूस की संस्कृति के प्रति, पुस्तकों के माध्यम से। यह पुस्तक निश्चय है भायेगी

  7. Shikha ki is book ne to tahelka macha rakha hai, jahan pahucho wahan iskee samikshha dikh jati hai..kya baat hai!! kuchh to hai:))

  8. इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार – आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर – पधारें – और डालें एक नज़र – थिस इज़ बेटर देन ओरिजिनल जी… – ब्लॉग बुलेटिन

  9. बहुत अच्छा किया है आपने यहां लिंक देकर कि कहां से इसे ऑन लाइन खरीदा जा सकता है। नहीं तो हमें भी आपकी तरह हिचकोले खाते जाना पड़ता खरीदने के लिए। इस पुस्तक परिचय के बाद हम तो रुकने वाले नहीं थे।

    आपका इस पुस्तक के बारे में परिचय पढ़कर तो इस पुस्तक को पढ़ने की ऐसी उत्कंठा जगी कि पहले ऑनलाइन खरीदा और फिर यह लिखने बैठा।

    समीक्षा या कहूं तो पुस्तक परिचय वास्तव में आपका बिलकुल हट के है। मेरा मानना है कि अगर किसी पुस्तक के बारे में लिखो तो ऐसा लिखो कि लोग उसको पढ़ने को लालायित हो जाएं। वरना न ही लिखो। आपने वही किया है।

    आभार इस प्रस्तुति के लिए।

  10. Sundar aalekh….pustak khareedkar padhne ka mera pahla mauka hoga yah bhi….aur maine bhi thaan rakha hai ki es baar jab holi main avkash par jaunga tab yah pustak khareedunga…. Kahin ek comment padha tha ki 75 page ki yah pustak Rs.300 main kuchh mahngi lagi…par agar ye Rs.3000.00 ki bhi hoti to kya tha…humne premchand ko nahi dekha…na aruna roy, salman rushdi, tasleema nasreen ko swabhav se jaante hain par jab aapke kisi hitaishi ki kitaab aapke haath main hogi to uska ahsaas hi vilakshan hoga…. Vaise mere mitr mandal main bhi es pustk ki kafi charcha hai…..aur sabhi adheerta se pratiksha kar rahe hain ki main kab ghar jaata hun…..:):)….

    Bahut hi sundar aalekh…

    Saadar…

    Deepak Shukla…

  11. दीपक जी,
    हिंदी पुस्तकों से अगर तुलना करें तो पुस्तक थोड़ी महंगी तो है, कीमत थोड़ी ज्यादा रखी गयी है पुस्तक की,
    लेकिन कंटेंट अनमोल है, तो दाम अखरता नहीं..

  12. सुंदर समीक्षा ॥पढ़कर बहुत अच्छा लगा मगर आप सब कुछ यहीं बता देंगे तो हो सकता है कुछ लोगों की इस किताब को पढ़ने की उत्सुकता कम हो जाये 🙂 भई आखिर सबका मिजाज़ एक सा नहीं न होता है!!:)

  13. मेट्रो की अच्छी खासी भीड़ में मैं खड़े खड़े किताब पढ़ रहा था.आसपास के कुछ लोग कभी मुझे देखते तो कभी किताब को देखते.
    किताब बांचने का यही सबसे उत्तम तरीका है जी! 🙂

    अच्छे से लिखा है किताब के बारे में। सुन्दर। तुम्हारी 'किडीश नेचर' वाली दी तो खुश हो गयी होंगी! बधाई!

  14. किताब को पढ़ना और फिर उसके बारे में लिखना महत्‍वपूर्ण काम है। यह बिरले ही कर पाते हैं। बधाई।

  15. किताब दिलचस्प मालूम होती है, पढ़ना चाहूंगी. शुक्रिया आपका. सोमवार को समोवार कर लें.

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