चोरी का अर्थ – विष्णु प्रभाकर

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Chori Ka Arth Laghukatha by Vishnu Prabhakarएक लम्बे रास्ते पर सड़क के किनारे उसकी दुकान थी। राहगीर वहीं दरख्तों के नीचे बैठकर थकान उतारते और सुख-दुख का हाल पूछता। इस प्रकार तरोताजा होकर राहगीर अपने रास्ते पर आगे बढ़ जाते।

एक दिन एक मुसाफ़िर ने एक आने का सामान लेकर दुकानदार को एक रुपया दिया। उसने सदा की भांति अन्दर की अलमारी खोली और रेजगारी देने के लिए अपनी चिर-परिचित पुरानी सन्दूकची उतारी। पर जैसे ही उसने ढक्कन खोला, उसका हाथ जहाँ था, वही रूक गया। यह देखकर पास बैठे हुए आदमी ने पूछा– “क्यों, क्या बात है?”

“कुछ नहीं” –दुकानदार ने ढक्कन बंद करते हुए कहा– “कोई गरीब आदमी अपनी ईमानदारी मेरे पास गिरवी रखकर पैसे ले गया है।”

 

About The Author – Vishnu Prabhakar

Vishnu prabhakarVishnu Prabhakar was an eminent Hindi writer. He had several short stories, novels, plays and travelogues to his credit. Prabhakar’s works have elements of patriotism, nationalism and messages of social upliftment. He was the First Sahitya Academy Award winner from Haryana. He was awarded the Sahitya Akademi Award in 1993, Mahapandit Rahul Sankrityayan Award in 1995 and the Padma Bhushan by the Government of India in 2004.

विष्णु प्रभाकर का जन्म उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के गांव मीरापुर में हुआ था. वे हिन्दी के सुप्रसिद्ध लेखक थे जिन्होने अनेकों लघु कथाएँ, उपन्यास, नाटक तथा यात्रा संस्मरण लिखे. उनकी कृतियों में देशप्रेम, राष्ट्रवाद, तथा सामाजिक विकास मुख्य भाव हैं.

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  1. Awara Masiha
  2. Aur Panchhi Ud Gaya
  3. Mukht Gagan Mein
  4. Abhav
  5. Sankalp
  6. Vishnu Prabhakar Ki LokPriya Kahaniyan
  7. Mera Vatan
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