मन एक रहस्मय लोक है – मुक्तिबोध के ‘सतह से उठता आदमी’ से कुछ अंश

मुझे लगता है की मन एक रहस्मय लोक है, उसमे अँधेरा है, अँधेरे में सीढियां हैं..सीढियां गीली हैं.सबसे नीचली सीढ़ी पानी में डूबी हुई है, वहां अथाह काला जल है, उस अथाह जल से स्वयं को भी डर लगता है.उस अथाह काले जल में कोई बैठा है, वो शायद मैं ही हूँ.

एक था पक्षी.वह नीले आसमान में खूब ऊँचाई पर उड़ता जा रहा था.उसके साथ उसके पिता और मित्र भी थे.सब बहुत ऊँचाई पर उड़नेवाले पक्षी थे.उनकी निगाहें भी बड़ी तेज थीं.उन्‍हें दूर दूर की भनक और दूर-दूर की महक भी मिल जाती.एक दिन वह नौजवान पक्षी जमीन पर चलती हुई एक बैलगाड़ी को देख लेता है. उसमें बड़े-बड़े बोरे भरे हुए हैं.गाड़ीवाला चिल्‍ला-चिल्‍ला कर कहता है, ‘दो दीमकें लो, एक पंख दो’.

उस नौजवान पक्षी को दीमक का शौक था.वैसे तो ऊँचे उड़नेवाले पक्षियों को हवा में ही बहुत-से कीड़े तैरते हुए मिल जाते, जिन्‍हें खा कर वे अपनी भूख थोड़ी-बहुत शांत कर लेते.लेकिन दीमक सिर्फ जमीन पर मिलती थीं. कभी-कभी पेड़ों पर-जमीन से तने पर चढ़ कर, ऊँची डाल तक, वे अपना मटियाला लंबा घर बना लेतीं.लेकिन वैसे कुछ ही पेड़ होते, और वे सब एक जगह न मिलते.नौजवान पक्षी को लगा यह बहुत बड़ी सुविधा है कि एक आदमी दीमकों को बोरों में भर कर बेच रहा है.

वह अपनी ऊँचाइयाँ छोड़ कर मँडराता हुआ नीचे उतरता है और पेड़ की एक डाल पर बैठ जाता है.दोनों का सौदा तय हो जाता है. अपनी चोंच से एक पंख को खींच कर तोड़ने में उसे तकलीफ भी होती है लेकिन उसे वह बरदाश्‍त कर लेता है.अब उस पक्षी रोज़ तीसरे पहर नीचे उतरता और गा‍ड़ीवाले को एक पंख दे कर दो दीमक खरीद लेता.कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा.ए‍क दिन उसके पिता ने देख लिया.उसने उससे कहा कि बेटे, दीमक हमारा स्‍वाभाविक आहार नहीं हैं, और उसके लिए अपने पंख तो हरगिज नहीं दिए जा सकते.लेकिन उस नौजवान पक्षी ने बड़े ही गर्व से अपना मुँह दूसरी ओर फेर लिया. उसे जमीन पर उतर कर दीमकें खाने की चट लग गई थी.अब उसे न तो दूसरे कीड़े अच्‍छे लगते न फल न अनाज के दाने.

लेकिन ऐसा कितने दिनों तक चलता. उसके पंखों की संख्‍या लगातार घटती चली गई.अब वह ऊँचाइयों पर, अपना संतुलन साध नहीं सकता था,आकाश-यात्रा के दौरान उसे जल्‍दी-जल्‍दी पहाड़ी चट्टानों गुंबदों और बुर्जो पर हाँफते हुए बैठ जाना पड़ता.उसके परिवार वाले और मित्र ऊँचाइयों पर तैरते हुए आगे बढ़ जाते.वह बहुत पिछड़ जाता.फिर भी दीमक खाने का उसका शौक कम नहीं हुआ.दीमकों के लिए गा‍ड़ीवाले को वह अपने पंख तोड़-तोड़ कर देता रहा.

फिर उसने सोचा कि आसमान में उड़ना ही फिजूल है.वह मूर्खों का काम है.उसकी हालत यह थी कि अब वह आसमान में उड़ ही नहीं सकता था, बड़ी मुस्किल से पेड़ की एक डाल से लगी हुई दूसरी डाल तक चल कर फुदक कर पहुँचता.बीच-बीच में गाड़ीवाला बुत्‍ता दे जाता.वह कहीं नजर में न आता.पक्षी उसके इंतजार में घुलता रहता.लेकिन दीमकों का शौक जो उसे था.उसने सोचा, ‘मैं खुद दीमकें ढूँढ़ँगा’.इसलिए वह पेड़ पर से उतर कर जमीन पर आ गया और घास के एक लहराते गुच्‍छे में सिमट कर बैठ गया.

फिर एक दिन एकाएक वह गाड़ीवाला दिखाई दिया.तब पक्षी ने कहा गाड़ीवाले! मैंने कितनी सारी दीमकें जमा कर ली है’
गाड़ीवाले ने कहा ‘तो मैं क्‍या करूँ’
‘ये मेरी दीमक ले लो, और मेरे पंख मुझे वापस कर दो’.
गाड़ीवाला ने कहा ‘मैं दीमक के बदले पंख लेता हूँ, पंख के बदले दीमक नहीं’

गाड़ीवाला चला गया.पक्षी छटपटा कर रह गया.एक दिन एक काली बिल्‍ली आई और अपने मुँह में उसे दबा
कर चली गई. तब उस पक्षी का खून टपक-टपक कर जमीन पर बूँदों की लकीर बना रहा था.

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विचित्र अनुभव!!
जितना मैं लोगों की पाँतों को पार कर
बढ़ता हूँ आगे,
उतना ही पीछे मैं रहता हूँ अकेला,
पश्चात्-पद हूँ।
पर, एक रेला और
पीछे से चला और
अब मेरे साथ है।
आश्चर्य!! अद्भुत!!
लोगों की मुट्ठियाँ बँधी हैं।
अँगुली-सन्धि से फूट रहीं किरनें
लाल-लाल
यह क्या!!
मेरे ही विक्षोभ-मणियों को लिये वे,
मेरे ही विवेक-रत्नों को लेकर,
बढ़ रहे लोग अँधेरे में सोत्साह।
किन्तु मैं अकेला।
बौद्धिक जुगाली में अपने से दुकेला।

ये कविता और कहानी मणि कौल द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सतह से उठता आदमी’ से ली गयी है.‘सतह से उठता आदमी’ गजानन माधव मुक्तिबोध के जीवन और उनके साहित्य पर आधारित है.मैंने मणि कौल की अब तक तीन फ़िल्में(उसकी रोटी,दुविधा,सतह से उठता आदमी) देखी हैं और सभी की सभी फ़िल्में अपने आप में उत्कृष्ट हैं.मणि कौल ने साहित्य के ऊपर बहुत सी फ़िल्में बनायी हैं..या ये कह लीजिये उनकी लगभग सभी फ़िल्में साहित्य से ही जुडी हुई हैं..मणि कौल की फिल्मों में आपको किसी प्रकार का मनोरंजन नहीं मिलेगा और शायद इसी वजह से हमारे देश में इनकी फ़िल्में चल नहीं पाती थीं…कितने तो ऐसे भी होंगे जो शायद जानते भी नहीं होंगे की मणि कौल साहब हैं कौन..इनकी फिल्मों में आपको मसाला नहीं मिलेगा, लेकिन फिर भी कुछ ऐसा अनुभव होता है इन फिल्मों को देखकर जिसे आप बयाँ नहीं कर सकते…एक लम्बे समय तक मणि कौल की फ़िल्में आपके ज़हन में बसी रहती हैं…और बहुत वक़्त लग जाता है इनकी फिल्मों से पूरी तरह बाहर निकलने में..मणि कौल की मैंने जो सबसे पहली फिल्म देखी थी वो थी ‘उसकी रोटी’ जिसे एक दो साल पहले शायद ‘लोक सभा’ चैनल पर देखा था.उनकी दूसरी फिल्म जो मैंने देखी थी वो थी ‘दुविधा’.ये फिल्म भी मुझे बहुत पसंद है.इस फिल्म के ऊपर भी एक पोस्ट आधी अधूरी लिखी हुई ड्राफ्ट में पड़ी है.मणि कौल की और फ़िल्में मुझे देखनी है लेकिन समस्या ये होती है की उनकी फ़िल्में जल्दी उपलब्ध नहीं हो पाती हैं.उनकी कुछ फ़िल्में जैसे ‘इडियट’, ‘नौकर की कमीज़’ और ‘नज़र’ जैसी फ़िल्में देखने की बहुत ईच्छा है..’नज़र’ कुछ समय पहले शायद दूरदर्शन या किसी दुसरे चैनल पर दिखाई जा रही थी, और मैं बस आधी फिल्म ही देख पाया, तो इसलिए भी इसे देखने का मन है.इनकी फिल्म ख़ास कर के ‘इडियट’ जो दोस्तोव्स्की के नॉवेल के ऊपर आधारित थी और मोहन राकेश की किताब पर आधारित फिल्म ‘आषाढ़ का एक दिन’ मुझे देखने का बड़ा ही मन है.

निश्चित तौर पे ये कहा जा सकता है भारतीय सिनेमा में मणि कौल की फिल्मों का एक अपना अलग स्थान है.उनकी फिल्मों में कविता और कहानी का जबरदस्त मिश्रण रहता है..शायद इसलिए मुझे उनकी फिल्म पसंद आती है..गुलज़ार, गुरु दत्त, बिमल राय की तरह ही मुझे मणि कौल की फ़िल्में बेहद प्रभावित भी करती हैं.आपने अगर मणि कौल की ये फिल्म(सतह से उठता आदमी) नहीं देखी है, तो जरूर से देखें..वैसे तो अगर आप अच्छी फ़िल्में देखने का शौक रखते हैं तो इनकी हर फिल्म आपको देखनी चाहिए.

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  1. बड़ी ही गहन सोच के साथ लिखी गयी पोस्ट है। कहानी भी बहुत बढ़िया है। कुल मिलकर इसे गहन भाव अभिव्यक्ति कहा जा सकता है। 🙂

  2. मणि कौल की 'उसकी रोटी' और 'दुविधा' देखी है…

    उनकी फिल्मो पर तो कुछ कहने के लिए शब्द ही नहीं मिलते…जिन फिल्मो का जिक्र किया है तुमने…वो सब देखने की कोशिश रहेगी.

  3. एक गहरी रुचि जगा गयी आपकी समीक्षा..अब देखनी पड़ेगी।

  4. मणि कौल का नाम तो बहुत सुना है, लेकिन फिल्म नहीं देखी कोई…अच्छा लिखा है तुमने. बस सभी स्थानों पर 'देखि' को 'देखी' कर लो 🙂

  5. आप किस दुनिया के हैं । आपकी पोस्ट पढकर लगता है कि कहीं दूर चले गए हैं हम । शायद अपने वास्तविक घर । मणि कौल की कोई फिल्म नही देखी पर देखनी है ।

  6. देखते हैं चचा..वैसे शोध फिल्म के बारे में मैंने अभी सर्च किया.२००३ में आई शोध फिल्म के बारे में आप कह रहे हैं क्या?मुझे सिर्फ उसी का लिंक मिला…

  7. शुक्रिया!!देखिये मैंने वो गलती हर बार की है…और देख कर भी नहीं देख पाए 🙂

  8. दीदी, उसकी रोटी और दुविधा सच में बहुत ही अच्छी फ़िल्में हैं…

  9. जरुर देखिये गिरिजा जी.मुझे भी उनकी बाकी फ़िल्में देखने का बड़ा मन है!!

  10. फिल्में देखने का शौक नहीं है, लेकिन हर वो चीज जो दिल-दिमाग और भावना को छुए पसंद है, इसलिए अच्छी फिल्में भी… लेकिन समस्या ये है कि नई और लोकप्रिय फिल्में तो मिल जाती है, अच्छी लेकिन गुमनाम फिल्में नहीं… अब इसका कोई हल हो तो बताओ… 🙂

  11. जब दूरदर्शन था तो इस तरह की कई फिल्मे देखी है , खँडहर जैसी फिल्मे भी देखी है ( बाप रे याद है फिल्म को देख कर घर पर सब कितनी गाली दे रहे थे फिल्म बनाने वाले को तब सब एक साथ बैठ कर फिल्मे देखते थे ) पहले पसंद भी आती थी किन्तु एक समय बाद लगने लगा जैसे की ये फिल्मे बड़ी निराशावादी सी होती है , ( किसी एक फिल्म की बात नहीं कर रही हूँ ) जो कई बार आगे के लिए कोई रास्ता नहीं सुझाती है आज के समय से परेशान व्यक्ति इन्हें देख कर और भी निराश हो जाये खुद में ही और उलझा जाये , पहले आर्ट फिल्मे कहते थे और आज समान्तर सिनेमा , लेकिन दूरदर्शन का साथ छूटते ही लगभग फिल्मो से भी साथ छुट गया है खासकर इस तरह की फिल्मो का |

  12. अब देखती हूँ….. वैचारिक सोच और उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाओं पर बनी फ़िल्में यकीनन सहेजने- देखने योग्य थांती हैं…..

  13. मणि कौल की कोई पिक्चर नहीं देखी… इस लेख ने जिज्ञासा जागा दी है ….

  14. बहुत बहुत शुक्रिया रश्मि जी….आप तो लगातार हमें पुराने दिनों में लेते जा रही हैं, मेरे पुराने पुराने पोस्ट को चर्चा में शामिल कर के!! 🙂

  15. अभी तक इनमे से एक भी नहीं देखी…तुम्हारे पास हो तो बताना…|
    बहुत अच्छी कहानी और कविता…|
    एक बात सीरियसली बोल रहे…बहुत गहराई से महसूसते हो और उतनी ही गहराई से लिखते भी हो…लगे रहो बच्चा…|

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