गुलज़ार साहब के साथ कुछ लम्हे (हैप्पी बर्थडे)

पुरे देश में अन्ना की हवा चल रही है.बैंगलोर भी इससे अछूता नहीं.यहाँ भी जगह जगह अन्ना के समर्थन में लोग घरों से बाहर सड़कों पर आ रहे हैं.जिन्हें लोकपाल बिल की ज़रा भी समझ नहीं वो भी सरकार का विरोध कर रहे हैं, सिर्फ इसलिए की वो सब इस भ्रष्टाचार से बुरी तरह त्रस्त हैं.बैंगलोर के फ्रीडम पार्क में हर कोने से लोग ज़मा हो रहे है.मैं भी दो दिनों से लगातार वहां जा रहा हूँ.आज भी वहां गया था.हर जगह चाहे वो अखबार हो,मिडिया या चाय की दूकान पर सब जगह यही खबर चर्चा में है.मैं भी इधर कुछ दिनों से इन ख़बरों को बड़े गौर से देख सुन रहा हूँ, ये बिलकुल भी दिमाग में नहीं आया था की आज किसी का जन्मदिन भी है.भला हो ट्विट्टर का जिसके जरिए सुबह सुबह याद आया की आज गुलज़ार साहब का जन्मदिन है.. अब जब ये बात याद आई तो बिना कुछ भी पोस्ट किये कैसे रह सकता था.

बहुत पहले, जहाँ तक मुझे याद है गानों की पहली समझ मुझे गुलज़ार साहब के गानों से ही आई थी.मेरे मामा के पास एक कैसेट थी “फुर्सत के रात दिन-गुलज़ार”(शायद यही नाम था, ठीक से याद नहीं).इस कैसेट के सभी गाने मुझे बहुत अच्छे लगते थे.तब मैं बड़ा कन्फ्यूजन में रहता था की आखिर गुलज़ार है कौन?फिल्म मेकर है?गीतकार है?या संगीतकार?या डाइरेक्टर??.ये तो पक्का पता था की जो भी हो एक्टर तो नहीं ही है गुलज़ार..लेकिन फिर कभी कभी लगता की क्या पता कहीं एक्टर ही हो ये गुलज़ार..बहुत बार टी.वी पे देखे हैं इसको..उस समय मुझे फिल्मों/गानों की बिलकुल समझ नहीं थी..धीरे धीरे ये बात पता चली की गुलज़ार गाना लिखते हैं.फिर तो जैसे जैसे गाने सुनना शुरू किया वैसे वैसे इनके गाने मुझे भाते चले गए…और धीरे धीरे ऐसा हो गया की मेरे कैसेट के कलेक्सन में बहुत से कैसेट गुलज़ार और मुकेश के रहने लगे.

मुझे लेकिन ये बात फिर भी नहीं मालुम थी की गुलज़ार शायरी और कवितायें भी लिखते हैं….ये बात एक फिल्म के जरिये पता चली थी…बहुत पहले एक फिल्म देखी थी मैंने, अशोक कुमार की “आशीर्वाद”.उस फिल्म में एक कविता थी(उदास पानी) जो मुझे बहुत पसंद आई थी..जब मालुम किया तो पता चला की इसे गुलज़ार ने लिखा है..वो कविता कुछ ऐसे थी ..


बस एक ही सुर में, एक ही लय में
सुबह से देख-देख कैसे बरस रहा
है उदास पानी
फुहार के मलमली दुपट्टे से
उड़ रहे हैं
तमाम मौसम टपक रहा है
पलक-पलक रिस रही है ये
कायनात सारी
हर एक शय भीग-भीग कर
कैसी बोझल सी हो गयी है
दिमाग की गीली-गीली सोचों से
भीगी-भीगी उदास यादें
टपक रही हैं
थके-थके से बदन में
बस धीरे-धीरे साँसों का
गरम दूबन चल रहा है

ये बात शायद २००० या २००१ की है.उन्ही दिनों से मुझे कवितायें और शायरी पढने का शौक लगा था.तब से आज तक उनकी कोई भी कविता/नज़्म मिल जाती है कहीं तो मैं लिख कर रख लेता हूँ…उन्ही दिनों की एक और नज़्म है जो मैंने पता नहीं कहा पढ़ा था, लेकिन वो ये याद है की अपने दोस्तों को ये नज़्म एक शाम खूब सुनाया था.

नये नये ही चाँद पे रहने आये थे
हवा ना पानी, गर्द ना कूड़ा
ना कोई आवाज़, ना हरक़त
ग्रेविटी पे तो पाँव नहीं पड़ते हैं कहीं पर
अपने वतन का भी अहसास नही होता

जो भी घुटन है जैसी भी है,
चल कर ज़मीं पर रहते हैं
चलो चलें, चल कर ज़मीं पर रहते हैं

ऐसे गुलज़ार साहब से जुड़े कई किस्से हैं, जिन्हें आपको सुनाता रहूँगा, इस श्रृंखला में.फ़िलहाल तो एक नज़्म आज आप सब के साथ बाँट रहा हूँ!

1857 के की क्रान्ति के ड़ेढ़ सौ साल पूरे होने के अवसर पे गुलज़ार साहब ने एक नज़्म लिखी थी.वो नज़्म भी आज यहाँ शेयर करने का दिल कर रहा है..

एक ख़याल था इन्क़लाब का, सन १८५७
एक जज़्बा था, सन १८५७
एक घुटन थी, दर्द था, अंगारा था जो फूटा था
ड़ेढ़ सौ साल हुए हैं
उसकी चुन चुन कर चिंगारियां हमने, रोशनी की है
कितनी बार और कितनी जगह बीजी हैं वो चिंगारियां हमने
और उगाये हैं पौधे उस रोशनी के
हिंसा और अहिंसा से, कितने सारे जले अलाव

कानपुर, झांसी, लखनऊ, मेरठ, रूड़की, पटना
आज़ादी की पहली पहली जंग ने तेवर दिखलाये थे
पहली बार लगा था कि कोई सान्झा दर्द है, बहता है
हाथ नहीं मिलते पर कोई उंगली पकड़े रह्ता है
पहली बार लगा था खून खौले तो रूह भी खौलती है
भूरे जिस्म की मट्टी में इस देश की मट्टी बोलती है

पहली बार हुआ था ऐसा,
गांव गांव, रूखी रोटियां बंटती थी
और ठन्डे तन्दूर भड़क उठते थे

चन्द उड़ती हुई चिन्गारियों से सूरज का थाल बजा था जब
वो इन्क़लाब का पहला गज़र था, सन १८५७

गर्म हवा चलती थी जब
और बया के घोंसलों जैसी पेड़ों पर लाशें झूलती थीं
बहुत दिनो तक महरौली में, आग धुएं मे लिपटी रूहें
दिल्ली का रस्ता पूछती थीं

उस बार मगर कुछ ऐसा हुआ
क्रान्ति का अश्न तो निकला था
पर थामने वाला कोई ना था
जाम्बाज़ों के लश्कर पहुंचे मगर
सालारने वाला कोई ना था

कुछ यूं भी हुआ, मसनद से उठते देर लगी
और कोई न आया पांव की जूती सीधी करे
देखते देखते शाम-ए-अवध भी राख हुई

चालाक था रहज़न
रहबर को इस क़ू-ए-यार से दूर कहीं बर्मा में जाकर बांध दिया
काश कोई वो मट्टी लाकर अपने वतन मे दफ़्न करे

आज़ाद हैं अब, अब तो वतन आज़ाद है अपना
अब तो सब कुछ अपना है
इस देश के सारी नदियों का पानी अपना है
लेकिन प्यास नहीं बुझती
ना जाने मुझे क्यूं लगता है
आकाश मेरा भर जाता है जब
कोई मेघ चुरा ले जाता है
हर बार उगाता हूं सूरज
खेतों को ग्रहण लग जाता है

अब तो वतन आज़ाद है मेरा
चिन्गारियां दो, चिन्गारियां दो
चिन्गारियां दो
मैं फिर से बीजूं और उगाऊं धूप के पौधे
रोशनी छिड़कूं जाकर अपने लोगों पर
वो मिल कर फिर से आवाज़ लगायें

इन्क़लाब! इन्क़लाब! इन्क़लाब!

अब, कुसुमाग्रज की एक मराठी कविता कणा जिसका हिन्दी अनुवाद(रीढ़) गुलज़ार ने किया..ये कविता सुनिए, आपका दिन बन जाएगा..

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  1. Shaandar dost ! love u

    कानपुर, झांसी, लखनऊ, मेरठ, रूड़की, पटना
    आज़ादी की पहली पहली जंग ने तेवर दिखलाये थे
    पहली बार लगा था कि कोई सान्झा दर्द है, बहता है
    हाथ नहीं मिलते पर कोई उंगली पकड़े रह्ता है
    पहली बार लगा था खून खौले तो रूह भी खौलती है
    भूरे जिस्म की मट्टी में इस देश की मट्टी बोलती है

  2. हमारी ओर से भी हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

  3. थोड़ा बढ़ हमारे घर भी आ जाते। गुलजार सदा गुलजार रहेंगे।

  4. वत्स!
    सबसे पहले तुम्हारा एक संदेह दूर कर दूं.. गुलज़ार साहब ने मेरी एक बेहद पसंदीदा फिल्म "गृह-प्रवेश" में अभिनय भी किया था.. हालांकि उसमें भी उन्होंने गुलज़ार का रोल किया है!!
    गुलज़ार साहब तो मेरे लिए एक धर्म हैं.. नज़्म की समझ उन्से सीखी है.. ल्किहने की कोशिश की, मगर नज़्म लिखना मेरे बस की बात नहीं..
    तुमने मेरी खोयी नज़्म मुझे देकर बड़ा एहसान किया.. तुम्हारा धन्यवाद!!

  5. हार्दिक बधाइयाँ

    kyonki

    अरे बेवफा, जब मेरे दोस्त अन्ना के साथ आन्दोलन कर रहे थे और मैं तेरी जुल्फों की छाँव में गुलजार को पढ़ रहा था

    deepakmystical.blogspot.com/2011/08/blog-post_18.html#comments

  6. अभिषेक,
    "उदास पानी" नाम से एक पूरा एल्बम आया था जिसमें अभिषेक रे का संगीत और खुद गुलजार साहब की आवाज में ८ नज्में थी। तुम्हारे पास शायद होगा, अगर नहीं तो बताना हम ईमेल कर देंगे।

    नीरज

  7. बढ़िया जानकारी दी है गुलज़ार साहब की …
    शुभकामनायें आपको !

  8. नके महान व्यक्तित्व के लिए क्या कहा जाय ….. शब्द ही नहीं मिलते

  9. सचमुच अन्ना आंधी ऐसी बही है कि उसमे ही उलझ कर रह गयी हूँ…और आज जाकर ये पोस्ट पढ़ने की सुध आई…

    बस क्या कहूँ….लाज़बाब लिखा है….और ऐसे ही गुलज़ार की और कविताएँ भी गाहे बेगाहे पोस्ट करते रहा करो…

  10. बहुत अच्छा लगा तुम्हारे शब्दों में गुलजार साहब को जानना.पोस्ट बहुत ही बढ़िया बन पड़ा है.

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