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Literature and Books

धुआँ – गुलज़ार

बात सुलगी तो बहुत धीरे से थी, लेकिन देखते ही देखते पूरे कस्बे में “धुआँ” भर गया। चौधरी की मौत सुबह चार बजे हुई...

दो आस्थाएँ – अमृतलाल नागर

  अरी कहाँ हो? इंदर की बहुरिया! - कहते हुए आँगन पार कर पंडित देवधर की घरवाली सँकरे, अँधेरे, टूटे हुए जीने की ओर बढ़ीं। इंदर...

यह कहानी नहीं – अमृता प्रीतम

पत्थर और चूना बहुत था, लेकिन अगर थोड़ी-सी जगह पर दीवार की तरह उभरकर खड़ा हो जाता, तो घर की दीवारें बन सकता था।...

एक जीवी, एक रत्नी, एक सपना – अमृता प्रीतम

  पालक एक आने गठ्ठी, टमाटर छह आने रत्तल और हरी मिर्चें एक आने की ढेरी "पता नहीं तरकारी बेचनेवाली स्त्री का मुख कैसा था...

छोटा जादूगर – जयशंकर प्रसाद

कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हंसी और विनोद का कलनाद गूंज रहा था। मैं खड़ा था उस छोटे फुहारे के पास,...

स्वर्ग के खंडहर में – जयशंकर प्रसाद

  वन्य कुसुमों की झालरें सुख शीतल पवन से विकम्पित होकर चारों ओर झूल रही थीं। छोटे-छोटे झरनों की कुल्याएँ कतराती हुई बह रही थीं।...

सिकंदर की शपथ – जयशंकर प्रसाद

  सूर्य की चमकीली किरणों के साथ, यूनानियों के बरछे की चमक से 'मिंगलौर'-दुर्ग घिरा हुआ है। यूनानियों के दुर्ग तोड़नेवाले यन्त्र दुर्ग की दीवालों...

ठाकुर का कुआँ – प्रेमचंद

1 जोखू ने लोटा मुंह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आई । गंगी से बोला-यह कैसा पानी है ? मारे बास के पिया नहीं...

नसीहतों का दफ्तर – प्रेमचंद

1 बाबू अक्षयकुमार पटना के एक वकील थे और बड़े वकीलों में समझे जाते थे। यानी रायबहादुरी के करीब पहुँच चुके थे। जैसा कि अकसर...

मैं ज़िन्दा रहूँगा – विष्णु प्रभाकर

दावत कभी की समाप्त हो चुकी थी, मेहमान चले गये थे और चाँद निकल आया था। प्राण ने मुक्त हास्य बिखेरते हुए राज की...

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