लिखना जैसे मेरे जीने का सहारा है – निर्मल वर्मा के संकलित पत्र

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पिछले महीने पटना में एक किताब खरीदी थी – ‘प्रिय राम’.इस किताब में निर्मल वर्मा के द्वारा अपने बड़े भाई चित्रकार रामकुमार को लिखे गए पत्रों का संकलन है, जिसका सम्पादन निर्मल जी की पत्नी श्रीमती गगन गिल ने किया है.जिस दिन मैं पटना से बैंगलोर आया था तो कुछ बातों से मन थोडा अशांत और अस्थिर था.उसी रात मैंने ये किताब पढ़ी.फिर तो जैसे एक अलग ही अनुभव हुआ.निर्मल वर्मा, जो मेरे प्रिय लेखक हैं उनके जीवन के उन पहलुओं को जाना जिनसे मैं अब तक अनजान था.पता नहीं क्यों लेकिन ये किताब पढ़ कर मुझे बहुत राहत मिली..बहुत से पत्र तो बिलकुल अपने से लगे. इन पत्रों में निर्मल जी जीवन की कुछ ऐसी बातें हैं जिनकी लगभग कोई जानकारी अब तक उपलब्ध नहीं थी.निर्मल जी और उनके बड़े भाई में किस तरह का स्नेह था ये इन पत्रों से साफ़ पता चलता है.जिस दिन मैंने ये किताब पढ़ी थी उसी दिन मैंने इन पत्रों में से कुछ यहाँ ड्राफ्ट में सेव कर लिया था.लेकिन बहुत दिनों तक इसे पोस्ट नहीं कर पाया.आज सोचा इसे ब्लॉग पर डालूं, फिर ख्याल आया की निर्मल जी के पत्रों से पहले उनके बारे में उनकी पत्नी और उनके बड़े भाई ने जो लिखा उसे यहाँ पोस्ट करूँ.निर्मल जी के पत्रों के कुछ अंश जो मैंने छांट कर अलग किये हैं,अगर संभव हुआ तो इसके बाद वाले पोस्ट में उसे डालूँगा.

निर्मल वर्मा की पत्नी गगन गिल के शब्दों में :
‘लिखना जैसे मेरे जीने का सहारा है…’
यह शुरू से शुरू नहीं है.अभी मेरी त्वचा उनसे जुड़ी हुई है जबकि वह कहीं दूर चले गये हैं.लेकिन दूर भी कहाँ ? उसाँस लेती हूँ तो लगता है सुन रहे हैं.हाथ की लिख छोड़ी चीज़ छूती हूँ तो उनकी छुअन महसूस होती है.कागज़ में उनकी उँगलियों की गरमायी.
मैं जो जब उन्हें मिली थी, तो मरने की आकांक्षा, मरने की ज़िद से भरी बैठी थी.जुलाई 1979 में पौने बीस साल की मैं.अभी-अभी पचास पूरे कर चुके निर्मल जी.मुझे क्या मालूम था, बरसों बाद एक दिन मैं उन्हें इतने कष्ट में देखूँगी कि उनकी नहीं, मेरी साँस भी कण्ठ में से फँस-फँस कर बाहर आयेगी.

मुझे ताज्जुब तब हुआ, जब पिछले वर्ष, अभी-अभी वेंटिलेटर के मारक कष्ट में से निकले निर्मल जी ने साउथ अफ्री़की नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक जे. एम. कोएत्ज़ी की एक किताब पढ़कर दूसरी शुरू कर दी.एक दिन मैंने पूछा भी, ‘इतने कष्ट में कैसे पढ़ लेते हैं ?’ उन्होंने कहा था, ‘सब प्राणियों में एक मनुष्य ही तो ऐसा प्राणी है, जिसके पास मानस है.माइंड, जिससे वह इस पृथ्वी पर अपने होने का अर्थ समझ सकता है.आखिर तक हमें इसका शोधन करते रहना चाहिए’.इससे पहले कि मैं उन पर पीड़ा की छाया देखती, उन्होंने पीड़ा को अपनी छाया से ढँक दिया था…हम धीरे धीरे आखिर तक जा रहे थे.बिना जाने .

या शायद हम भी अपनी जिद पर कायम थे. बचने की नहीं, जीने की जिद पर

‘आखिर तक’ में कितनी परीक्षाएं उन्होंने दीं.कितनी मुझे देनी पड़ेंगी.ऐसी एक परीक्षा में मुझे बैठा कर वह चले गए हैं…

करीब दस साल पहले जब मैं रामकुमार के कृतित्व पर वढेरा आर्ट गैलरी के लिए एक सन्दर्भ पुस्तक सम्पादित कर रही थी, ‘ए जर्नी विदइन’, रामकुमार मेरे लिए शोध का विषय थे. निर्मल जी को जब मैं राम से हुई अपनी बातचीत के ब्यौरे बताती, वह खूब हँसते. खासकर जब मैं बताती कि आज इंटरव्यू के दौरान राम ने बीस सिगरेटें पीं.राम के धूम्रपान का सीधा सम्बन्ध टेप रिकॉर्डर के ऑन होने से जुडा़ था, जैसे ही मैं उसे बन्द करती, उनका सारा तनाव उड़ जाता.राम से जितनी भी सुन्दर बातें होतीं, तभी हो पातीं, जब टेप रिकॉर्डर बन्द होता. उन दिनों मैं कभी राम से मिलकर घर लौटती, तो निर्मल सबसे पहले यही सवाल करते, ‘आज रामकुमार ने कितनी सिगरेटें पीं ?’
दोनों भाई अपने अपने क्षेत्र में कला की सुघड़ता के, कला के सत्य के कितने आग्रही रहे हैं, यह मेरे सीखने के लिए एक बड़ा पाठ रहा है.कला का सत्य स्वयं रचनाकार का सत्य हो, सार्वजनिक और निजी – दोनों आकाशों में गूंजता हुआ-यह दोनों की जीवन भर की साधना है.रामकुमार के अमूर्त चित्रों में मनन की छवियाँ किस प्रकार हमें ठिठका कर अवाक् कर देती हैं, सब जानते हैं.
निर्मल जी को एक-एक शब्द की प्रतीक्षा में घण्टों बैठे हुए मैंने देखा है.और फिर उन शब्दों को, जो नाड़ियों के जाने कौन से अंधेरे को लांघकर उनके कोरे कागज़ तक पहुँचते थे, काटते हुए भी. वह ईमानदार शब्द और सत्यवान शब्द के बीच अन्तर कुछ ही क्षणों में पकड़ लेते थे. उनकी कलम एक योगी की तरह शान्त और हत्यारे की तरह उत्सुक रहती थी. इतनी कष्टप्रद प्रक्रिया के बाद पाये एक-एक शब्द को वह उसी निस्संग निर्ममता से काट-छाँट देते थे-उनकी कॉपी जैसे किसी संग्राम में क्षत-विक्षत होकर मेरे तक पहुँचती थी.तिस पर भी मैं उन्हें दुबारा, तिबारा ड्राफ़्ट बनाने का श्रम-साध्य कार्य करते हुए देखती, तब भी जब उन्हें वे पन्ने केवल मुझे ही टाईप करने के लिए देने होते थे. विशेषकर ‘अंतिम अरण्य’ को टाईप करने के दिनों में मैंने उनके लिखे लगभग हर शब्द को उनकी रगों में से बाहर उजाले की ओर आते देखा था.साक्षात.
एक तरह से, और शायद सच्ची तरह से, निर्मल जीवन पर अपने छोटे भाई के छोटे भाई रहे.उन्होंने साहित्य का परिचय, लेखन और कला का संस्कार रामकुमार से ही लिया था.कला के रहस्यों को जानने का उल्लास, जो सुदूर बचपन में शुरू हुआ था, जीवन-पर्यंत बना रहा.एक ज़माना पहले, लगभग बीस साल की वर्ष एं शिमला के ग्लेन झरने पर मित्रों के साथ पिकनिक मनाते हुए, निर्मल ने राजकुमार को याद किया था.अभी उनके कागजों में एक चित्र मिला, कुछ सोचते से बैठे हैं, हलकी मूंछे, पीछे मित्रों का झुण्ड.तस्वीर के पीछे लिखा था – A day in Glen.To Dearest Ram Kumar-who is more than a brother…a sympathetic and sincere friend. Nirmal, 3 July, 1950.
जीवन भर दोनों भाइयों में स्नेह का नाजुक धागा बँधा रहा, बड़ी मज़बूती से.वे कहे के साथी थे, और अनकहे के भी.एक-दूसरे को देखकर वे जैसे उल्लसित हो उठते, हम पत्नियों के लिए विस्मिय का विषय था. ‘इनकी कभी लड़ाई नहीं होती ?’ मैं और छोटी भाभी जी एक दूसरे से पूछतीं.
बाद के वर्षों में जैसे-जैसे निर्मल एक बौद्धिक सामाजिक भूमिका में अवस्थित होते गये, रामकुमार अपने भीतर की सीढ़ियाँ उतरते गये. पारिवारिक बैठकों में कई बार राम ने उन्हें उनकी आलोचना के क्रूर पक्ष से आगाह किया, लेकिन निर्मल के सारे संवेग हमारे अराजक समय में एक अर्थवान हस्तक्षेप करने में संलग्न हो चुके थे. यह विचार के प्रति उनकी गहरी आस्था थी, जिसके चलते हम उन्हें न रोक सकते थे, न बचा सकते थे, केवल लहूलुहान होते देख सकते थे.उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता उन्हें बेहद अकेला कर रही थी, उनके अपने इस अकेलेपन में भी अन्त तक वह कितने तेजस्वी बने रहे-इस तथ्य से उनके घोर विरोधी भी इनकार नहीं कर सकते.
निर्मल जी के जीते-जी और मृत्युपरांत भी उन पर तरह-तरह के क्षुद्र आक्षेप होते रहे हैं.इन अर्द्धसत्यों ने उनके बहुत सारे पाठकों को विचलित किया है, मुझे भी. लेकिन अब वह आइने के दूसरी ओर चले गये हैं और मेरे पास दुनिया से साझा करने के लिए केवल यह आग है, उनके दस्तावेजों की आग, जिसमें से तप कर वह गुज़रे थे…ये पत्र अपनी ऐतिहासिकता में आज इसलिए महत्वपूर्ण हैं, कि इनमें उनके मोहभंगों के सूत्र हैं. वह एक दिन में कम्युनिस्ट-विरोधी नहीं हो गये थे और न एक दिन में भारत-प्रेमी. उनकी प्रज्ञा मूलतः प्रश्नाकुल थी, आलोचक नहीं. अपने इस अदम्य साहस में वह उपनिषदिक परम्परा के उत्तराधिकारी कहलाने के अधिक निकट थे, बजाय औपनिवेशिक संस्कृति की पैदावार होने के. अंग्रेज़ सरकार में पिता की नौकरी के कारण उनकी तालीम में अंग्रेज़ियत की प्रमुख भूमिका रही थी, और इसी कारण उन्हें ‘भारतीयता’ उतनी सहजता और बिना फांक उपलब्ध नहीं हुई थी, जितनी उनके कई मुखर आलोचकों को. लेकिन उन्होंने अपनी इस ऐतिहासिक स्थिति विशेष को न शर्मसारी का सबब बनने दिया, न अहं का.उनके आलोचक उन्हें शर्मसार करने में जुटे रहे, और उनके अधिकतर दुनियादार साथी अंग्रेज़ी दुनिया में सिक्का जमाने में.
निर्मल जी दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफ़न्स कॉलेज से निकलने वाले एक मात्र लेखक हैं जिन्होंने हिन्दी जैसी सादी भाषा को चुना.(सादी भाषा चुनना कई मायनों में सादी दुलहिन चुनने जैसा होता है, जहाँ आप उसके प्रेम के प्रति आश्वस्त होते हैं और दहेज न लाने के प्रति भी) बरसों पहले, और आज भी, जब अधिकांश भारती विदेशी जूठन बनने के लिए प्रस्तुत थे/हैं, निर्मल जी केवल अपने अन्तःकरण की आवाज़ सुनकर भारत लौट आये थे, जैसा इन पत्रों से स्पष्ट है.उन्होंने अपनी अस्मिता की भारतीय पहचान को टुकड़ा-टुकड़ा अर्जित किया था. न केवल अपने लिए, बल्कि अपने जैसे उन सब व्याकुल सुधीजनों के लिए, जो एक औपनिवेशिक दास-समय द्वारा स्वयं के रेखांकित किये जाने से उनकी ही तरह व्यथित थे. प्रायः निर्मल जी के अभावग्रस्त जीवन की चर्चा की जाती है, लेकिन मैं नहीं समझती, निर्मल जी ने जानते-बूझते अभाव का जीवन चुना था.उन्होंने केवल चुनाव किया था, उस भाषा में लिखने का चुनाव, जो उन्हें उनकी माँ की, उनके स्वप्न की बातचीत की भाषा थी. वह भाषा उन्हें जीवन भर साधारण वित्त का रखने वाली है, इस पर तो उन्होंने शायद कभी सोचा भी नहीं होगा, किसी के आगाह करने पर भी नहीं.
प्रायः निर्मल जी के अभावग्रस्त जीवन की चर्चा की जाती है.लेकिन मैं नहीं समझती, निर्मल जी ने जानते बुझते अभाव का जीवन चुना था.उन्होंने केवल चुनाव किया था, उस भाषा में लिखने का चुनाव, जो उनकी माँ की, उनके स्वप्न की बातचीत की भाषा थी.वह भाषा उन्हें जीवनभर साधारण वित्त का रखने वाली है, इस पर तो उन्होंने शायद कभी सोचा ही नहीं होगा, किसी के आगाह करने पर भी नहीं..
वह स्वप्न और आदर्श में जीने वाले व्यक्ति थे. जीवन के अन्तिम समय तक न उनके आदर्श धुँधले पड़े न उनके स्वप्न और निर्मल जी थे, कि जाते-जाते दोनों चीज़ें अक्षुण्ण पीछे छोड़ गये.और अपनी अदम्य, अधक जिजीविषा-जिसे अब मुझे और उनके पाठकों को भरपूर जी कर पूरा करना है.ऐसी परीक्षा वह हमारी जाते जाते ले गए हैं….
निर्मल जी के निधन के बाद रामकुमार जी ने उन्हें एक अन्तिम पत्र लिखा था..उसके कुछ अंश:
(25.12.2005)
प्रिय निर्मल ,
इस बार इतनी लंबी यात्रा पर जाने से पहले तुम अपना पता भी नहीं दे गए.
यह अंतिम पत्र तुम्हे नहीं भेज सकूँगा.यह मैं हीं पढ़कर अपने पास सुरक्षित रख लूँगा तुम्हारे हमारे पत्रों के साथ.यह सोच कर मुझे आश्चर्य होता है कि तुम्हारे पैदा होना का दिन भी मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है, जब शिमला के हरबर्ट विला के एक कमरे में हम भाई-बहन बैठे थे और पीछे कमरे में से दाई ने आकार हमें सुचना दी कि लड़का हुआ है.तब मेरी उम्र पांच के करीब रही होगी.और 75 वर्ष बाद का वह अन्तिम दिन मेडिकल इन्स्टिटूट एम्बुलेंस में जाते हुए जब मेरे सामने स्ट्रेचर पर तुम आँखे बंद किये लेटे हुए थे, तब विश्वास नहीं हो रहा था कि तुम घर लौटकर वापस नहीं आओगे.एक अरसे बाद बिमारी के सब कष्टों और यातनाओं से मुक्ति पाकर तुम्हारे चेहरे पर ऐसी आलौकिक शान्ति और ठहराव कि छाया दिखाई दे रही थी मानो एक लंबी यात्रा का अन्तिम पड़ाव आ गया हो.तुम तो इस पड़ाव पर पहले ही पहुँच गए थे.अम्बुलेंस में तो केवल तुम्हारा पार्थिव शरीर ही था.एम्बुलेंस के सायरन की चीखें सुनते ही सड़क की भीड़, दिवाली के दिनों की रोशनियाँ, जगमगाती दुकानें गुज़रती रहीं और मैं सोचता रहा की यह रास्ता कभी समाप्त नहीं होगा.कई बार हमने तुम्हे उठाने की कोशिश की लेकिन एक लम्बे समय के बाद उस शांत निद्रा से तुम उठाना नहीं चाहते थे.
मकड़ी के जालों में उलझी पिछले 60-70 वर्षों की अनगिनत स्मृतियाँ आँखों के सामने धुंधली आकृतियाँ बनकर सजीव हो उठती हैं लेकिन उस यात्रा के पथ पर वापस लौटते हुए उसकी व्यर्थता और पीड़ा का अहसास भी होने लगता है.तुम्हे याद होगा कि जब कभी कुछ पीते हुए हम एक लंबे समय के लिए बैठते थे तो प्रायः बातचीत बहुत पुराने बीते हुए समय कि स्मृतियों में खो जाती थी.शिमला कि कोई पुरानी घटना ,या कोई व्यक्ति या परिवार का सदस्य हमारे बीच में उपस्थित हो जाता था.मैं तुमसे कहता था कि भज्जी हाउस,कैथू और शिमला को लेकर तुम्हे एक उपन्यास लिखना चाहिए.तुम मुस्कुराने लगते थे लेकिन कभी लिखने कि हामी नहीं भरी.और भी कितनी बातें अधूरी ही रह गयी.
पिछले एक वर्ष के दौरान तुमसे विभिन्न अस्पतालों में ही भेंट होती थी-विशेषकर मेडिकल इन्स्टिटूट के प्राइवेट वार्डों में.आज भी कभी कभी अचानक यह भ्रम होने लगता है कि तुम अस्पताल के किसी कमरे में लेते हो और शाम को तुमसे भेंट होगी.
वर्षों तक मित्रों, सम्बन्धियों आदि को पत्र लिखने में ख़ुशी ही होती थी, डाकिये को देखकर चिट्ठी पाने और पढने का कौतहुल होता था.समय बीतने के साथ साथ वे सब पीछे छूटते गये और पत्र मिलने की आदत ही छुट गई.अकेले तुम ही रह गये जिसे किसी दुसरे शहर से पत्र लिखकर अपने आप को हल्का-सा महसूस करता था.अपनी ख़ुशी और शंकाओं को तुम्हारे साथ बांटकर मैं अपने आप को अकेला महसूस नहीं करता था.यही बात तुम्हारे दुसरे मित्र, परिचित और सम्बन्धी भी महसूस करते थे.तुम बहुत धैर्य से उनकी बातें सुना करते थे जिससे तुम्हारे घर पर आने वाले लोगों का ताँता बंधा रहता था.चाहे वह दिल्ली हो, या शिमला या भोपाल -चाहे वे लेखक बनने के स्वप्न देखने वाले युवा छात्र हों, या प्रथिस्थित लेखक, चित्रकार या बुद्धिजीवी या तुम्हारे पुराने दोस्त-किसी को तुम्हारे घर आने में कूई हिचक नहीं होती थी.तुम खुली बाहों से सबका स्वागत करते थे.

कोई नहीं जानता था कि ये तुम्हारी जिंदगी के अन्तिम 20 दिन थे.वार्ड नंबर दो में कमरा नंबर 12 में तुम्हे देखने के आदी हो गए थे.तुम ऑक्सीजन का मास्क लगाये चारपाई पर लेटे दिखाई देते थे.रोज डॉक्टर तुम्हारी परीक्षा करके कहते थे कि तुम बिलकुल ठीक हो गए हो और जब चाहो तब घर जा सकते हो.इस बार तुम्हारी घर लौटने कि इच्छा नहीं थी.तुम्हारे मन में कहीं डर था.लेकिन अस्पताल में अधिक दिन तक रहना संभव नहीं था.ये अन्तिम दिन देर तक याद रहेंगे.तुम जीवित रहते तो बाद में हम इन दिनों कि चर्चा अवश्य करते.

तुम्हे शायद याद नहीं कि कुछ महीने पूर्व जब वेंटिलेटर लगा हुआ था और तुम बोल नहीं सकते थे तो अचानक एक दिन कॉपी पर तुमने लिखा – “Am I dying?” हम चौंक गए और गर्दन हिला कर इंकार दिया और आश्वाशन दिया.तुम्हे ये विश्वास था कि अभी जाने का समय नहीं आया है और इस बार भी तुम स्वस्थ होकर ही लौटोगे.
उन दिनों अचानक तुम्हे बातें करने में बहुत आनंद आने लगा.शाम को भेंट होने पर तुम ऑक्सीजन का मास्क हटाकर बड़े उत्साह से बातें करने लगते.कुछ अस्वाभाविक भी जान पड़ता था.तब पता नहीं था कि कुछ दवाएं इतनी अधिक मात्रा में दी जा रही थीं जिनकी प्रतिक्रिया इस तरह प्रकट हो रही थी.तुम्हारे इस उत्साह को देखकर हमें भी बहुत खुशी होती थी और यह उम्मीद जगने लगी थी कि तुम स्वस्थ हो रहे हो.तब जान नहीं सके कि एक बहुत कमज़ोर धागे में तुम्हारी जिंदगी बंधी हुए है और यह कभी भी टूट सकता है.
कभी कभी तुम्हारे कष्टों को देखकर तो ऐसा लगता था की तुम्हे इससे मुक्ति मिले तो शायद वह बेहतर होगा.ज़िन्दगी के जिस कगार पर हम खड़े थे वहां कभी किसी को भी कुछ हो सकता था जिसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए.हम धीरे धीरे उस स्थिति के आदि हो गए थे.लेकिन आज तुम्हारे चले जाने के बाद कभी कभी अंधकार में वह धुंधली सी रौशनी में चमकती खाली जगह दिखाई देती है जहाँ हमेशा तुम दिखाई देते थे.अब वह खाली पड़ा है, कभी भरेगा भी नहीं.
यह अन्तिम पत्र लंबा होता जा रहा है
अच्छा –
रामकुमार
Meri Baateinhttp://meribaatein.in
Meribatein is a personal blog. Read nostalgic stories and memoir of 90's decade. Articles, stories, Book Review and Cinema Reviews and Cinema Facts.

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  1. पत्र हमारी थाती होते हैं…
    आपने पुस्तक पढ़ने के अपने अनुभव को साझा करने का श्रमसाध्य कार्य किया है इस पोस्ट में. 'प्रिय राम' से परिचय कराने का आभार!

  2. शब्जों का सहारा न रहे तो मन वह न रह पायेगा जो बनना चाहता है, बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत रचना।

  3. एक सहेजने योग्य पोस्ट …… सच में शब्द मन का बड़ा सहारा होते हैं…..

  4. इन खतों को पढ़ने के बाद पता चलता ही कि ई-मेल और एस.एम्.एस. के माध्यम से हमने क्या खोया है!!
    बहुत अच्छी प्रस्तुति!!संग्रहणीय!!

  5. आपके पोस्ट पर आना सार्थक हुआ । बहुत ही अच्छी प्रस्तुति । मेर नए पोस्ट "उपेंद्र नाथ अश्क" पर आपकी सादर उपस्थिति प्रार्थनीय है । धन्वाद ।

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