मनुष्य जरूरत पड़ने पर अपने को किसी भी जीवन ढाँचे में ढाल सकता है – निर्मल वर्मा के पत्र

(इन खतों को जिस दिन मैंने पढ़ा था, उसके बाद इसमें से कुछ न कुछ ड्राफ्ट में सेव करता गया.पोस्ट काफी बड़ी और क्लटरड हो गयी थी.इस वजह से काफी दिन पोस्ट करने का दिल नहीं किया..कल रात कोशिश की थी की वो क्लटरनेस थोड़ी कम हो और पोस्ट थोड़ी छोटी हो, लेकिन फिर भी पोस्ट कोशिशों के बावजूद लंबी ही रही और अनॉर्गनाइज़्ड भी…लेकिन फिर भी उनके लिखे 68 खतों से कुछ अंश निकाल निकाल कर यहाँ एक साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ…निर्मल वर्मा के चाहने वालों के लिए पोस्ट की लम्बाई मेरे ख्याल से कोई मायने नहीं रखेगी…उतने खतों में से जो थोडा बहुत यहाँ मैंने डाला है, उसमे गलतियाँ हो सकती हैं, कृपया इग्नोर करें!)

प्रिय राम

लंबे अरसे के बाद तुम्हारा पत्र मिला.इस समय तक तुम दिल्ली लौट आये होगे.हार्वन में तुमने काफी शान्ति और ख़ामोशी में अपनी छुट्टियाँ बितायी होगी.मैं वहाँ कभी नहीं गया किन्तु तुम्हारे पत्र से उसके सौंदर्य कि कल्पना कर सकता हूँ.मैंने गिन कर हिसाब लगाया कि लगभग 20 वर्ष पहले मैं काश्मीर गया था.उसकी स्मृति अब भी बहुत साफ़ है.क्या तुम मानसबल या वुलर भी गए थे?तुमने काश्मीर में अन्तिम सप्ताह पहलगावं में बिताया, यह जानकार खुशी हुई.दिल्ली लौटने पर तुम्हे सचमुच काफी भयानक सा लगता होगा-बेहतर होता अगर तुम सितम्बर तक वहाँ रुके रहते.यों भी काश्मीर का पतझड़ अपने में अद्दुतीय सुख है-जिसकी मैं सिर्फ कल्पना कर सकता हूँ.तुम तो वहाँ रह चुके हो.

मैं तुम्हे क्लाद्नो से लिख रहा हूँ, जहाँ बकुल का अस्पताल है.वह और पुतुल(बेटी) एक ही कमरे में रहते हैं.अस्पताल के पीछे रेलवे लाईन है जहाँ से प्राग कि दिशा में रेलें जाती हैं.रात को पुतुल के सोने के बाद मैं अक्सर टेरेस पर बैठा रहता हूँ.दूर दूर तक जुलाई का तारों भरा आकाश और शहर कि रोशनियाँ टिमटिमाती दिखाई देती हैं.प्राग में आजकल मेट्रो बनाने के लिए सड़कें खोदी जा रही हैं, सब कुछ उल्टा पुल्टा जा रहा है, आजकल यहाँ का सबसे प्रिय मजाक यह है कि किसी ने एक अँगरेज़ टूरिस्ट से पूछा कि उसे प्राग कैसा लगा-उत्तर में उसने कहा, It is a nice cite, but I wish I should have come here before the earthquake! यों भी गर्मियों में मुझे प्राग एकदम पराया शहर जान पड़ता है-टूरिस्टों से भरा हुआ-इसलिए हफ्ते में एक दो बार यहाँ आकार बहुत अच्छा लगता है.हम संभवतः नवंबर तक यहीं रहेंगे.

यहाँ कुछ दिन पहले हमने मार्सेल मार्चो के pantomine का एक प्रदर्शन देखा, जो बहुत पसंद आया था.रुसी फिल्म War & Peace के पहले दो भाग भी देखे.फिल्म काफी रियलिस्टिक है और बहुत बड़े पैमाने पर बनायीं गयी है.अंतोनियोनी लो दिलम ‘रेड डेजर्ट’ भी यहाँ दिखाई जा रही है.कभी कभी यहाँ रात को माला-स्त्रना के बागों में चेंबर म्यूजिक के कंसर्ट होते हैं.पिछले सप्ताह मैं एक ऐसे ही कंसर्ट में गया था-ऊपर खुला आकाश, कुछ थोड़े से लोग और बीथोवेन या मोत्सार्ट का संगीत.ऐसी घड़ियाँ में सब थकन और उब मिट जाती है.इन दिनों खाली समय में मुझे बहुत दिलचस्प पुस्तकें पढ़ने को मिलीं.यहाँ हाल में अंग्रेजी पुस्तकों कि एक नयी लाइब्ररी खुली है, जो मेरे मनोरंजन का नया साधन है.अगर तुम्हे स्टीफन स्पेंडर कि आत्मकथा ‘वर्ल्ड विदिन वर्ल्ड’ पढ़ने को मिले तो अवश्य पढ़ना.पिछले दिनों शायद ही किसी पुस्तक ने अपनी इमानदारी और संवेदनशीलता के कारण मुझे इतना उद्द्वेलित किया हो.उसे पढते हुए आदमी खुद अपने जीवन कि उलझनों,कुंठाओं और तनावों को ज्यादा सफाई और तटस्थता से समझने कि कोशिश करने लगता है.किन्तु जिस चीज़ ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, वह लेखक कि humbleness  या capacity to bear humilaitions है.यों एक कवि का गद्ध भी इतना पवित्र और प्रवाहपूर्ण हो सकता है, यह मेरे लिए अद्दुतीय अनुभव था.उसके अलावा नीरद चौधरी कि भी अन्तिम दो पुस्तकें पढ़ी-मैं धीरे धीरे उनका ‘भक्त’ होता जा रहा हूँ.शायद हिंदुओं का इतना खरा और सही विवेचन तुम्हे कहीं और नहीं मिलेगा.

प्राग में इन दिनों हर दूसरे तीसरे दिन बर्फ गिरती है.मैंने प्राग में इतनी बर्फ पहले कभी नहीं देखी.कभी कभी रात के समय टहलते हुए बर्फ में ढँका प्राग बहुत विचित्र सा जान पड़ता है.हालांकि बीच बीच में धुपिले दिन आ जाते हैं जो ज्यादा टिकते नहीं.मैं अक्सर सुबह काम करने के लिए नदी के सामने वाली कॉफी हाउस मेंचाला जाता हूँ.कासल के पास कि पहाड़ी और पेड़ों कि कतार एक सफ़ेद ख़ामोशी में ढँकी रहती है.

दस दिन पहले बकुल लन्दन चली गयी.ज्यों ही बकुल के लन्दन में रहने और काम करने की उम्मीद नज़र आएगी,मैं पुतुल को लेकर लन्दन चला जाऊँगा.फ़िलहाल मुझे प्राग का कमरा सहसा बहुत सुना-सा जान पड़ता है.यों इस सूनेपन को यहाँ की राजनितिक हलचलों ने बहुत हद तक दूर कर दिया है.कल दोपहर चेक प्रेसिडेंट नोवोत्नी को पब्लिक ओपिनियन के सामने झुक कर त्यागपत्र देने के लिए बाध्य होना पड़ा.समूचे सामजिक-सांस्कृतिक वातावरण में एक ऐसी ताजगी दिखाई देती है जो नए डेमोक्रेटिक परिवर्तनों की उपज है.सुबह सुबह अखबारों हाथों-हाथ बिक जाते हैं.रेडियो,टेलीविजन में रोज खुले तौर से पुरानी व्यवस्था की कड़ी आलोचना की जाती है.पूर्वी यूरोप में यह बिलकुल एक नए किस्म की क्रान्ति है, जहाँ एक रात में सारा सेंसर खत्म हो गया है.इस शांतिपूर्ण क्रान्ति का ड्रामा देखने के लिए आजकल प्राग में पश्चिमी और अमेरिका के सैंकडों पत्रकार जमा हैं.कहा जाता है, चीन के रेड गार्ड्स के आंदोलन के बाद ऊपर से नीचे तक हिला देने वालों का इतना बड़ा आंदोलन कहीं नहीं हुआ.

(लन्दन से लिखे पत्रों में से)

यहाँ आजकल कड़ाके का जाड़ा पड़ रहा है.बाहर निकलते ही दुबारा घर लौटने की इच्छा होती है,.मैंने अरसे से यहाँ धुप नहीं देखी-न बर्फ गिरती है.सिर्फ धुन्ध और पीला मेघाच्छन्न आकाश.किन्तु बीच शाहद में क्रिसमस की रोशनियाँ और दुकानों की रंगारंग सजावट कहीं कहीं जोड़ नहीं.इस धूमधाम और चकाचौंध की प्राग की शांत भीड़ों और खाली दुकानों से कोई तुलना नहीं.मैं वैसे बहुत कम बाहर निकलता हूँ.मुझे अपने आसपास के शांत इलाकों में ही घूमना अच्छा लगता है.प्राग छोड़ने के बाद यहाँ मैं काफी अकेला पड़ गया हूँ.लेकिन अब मुझे यह अकेलापन उतना ही अच्छा लगता है जितनी प्राग की हलचल.मेरे पास काफी समय रहता है और मैं बहुत सी चीज़ों के बारे में सोच सकता हूँ और मुझे रोजमर्रा की राजनीति ज्यादा परेसान बेचैन नहीं करतीं.

भारत लौटने में कई दुविधाएं हैं.मेरे टिकट की समस्या अभी तक हल नहीं हुई,.अगर मेरी टिकट की समस्या हल हो गयी तो मैं अक्टूबर के शुरू में ही प्राग से होता हुआ भारत लौट आऊंगा.क्या तुम सोचते हो की वापिस आने पर मुझे किसी तरह का काम मिल सकेगा?इतने लंबे अरसे के बाद मैं अपने को अपने ही देश में काफी अजनबी सा पाऊंगा,यह चीज़ मुझे काफी असंगत और हास्यास्पद सी लगती हैं.किन्तु इसका सामना कभी न कभी करना ही होगा.

फिल्म निर्देशक को मैंने पत्र लिख दिया है.मैंने उन्हें तुमसे मिलने के लिए लिखा था.क्या कहानी के लिए 5000 रुपये पारिश्रमिक बहुत अधिक नहीं होगा?फिर भी जैसा तुम ठीक समझो,उनके साथ बातचीत करके तय कर लेना.यहाँ अंग्रेजी प्रकाशक से बातचीत ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकी.मैंने फ़िलहाल उन्हें ‘वे दिन’ का पहला परिच्छेद दिया है, जो बहुत पहले वैद ने अनुवादित किया था.उन्होंने अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया है.

पिछले दिनों मेरी स्थति में काफी सुधार हो गया है.बुखार अब नहीं आता और कमजोरी लगभग खत्म हो गयी है(फेफरों की कमजोरी के प्रथम संकेत).शायद अगले सप्ताह मुझे निश्चित रूप से कुछ पता चल सकेगा की मुझे अस्पताल में कितना अरसा रहना पड़ेगा.एक्सरे की नयी फिल्म के आधार पर हीं डॉक्टर किसी निर्णय पर पहुँच सकेंगे.यों पहले से तो मैं बहुत बेहतर महसूस करता हूँ-किन्तु हर नया दिन पुराने दिनों को दुहराता सा जान पड़ता हा.आदमी धीरे धीरे उब का भी आदी हो जाता है.

यह जानकार खुशी हुई की परिंदे के कॉपीराईट के बारे में मि.पुरोहित तुमसे बातचीत पक्की कर गए,इस आशय का उन्होंने मुझे पत्र भेजा था.मैंने उन्हें लिख दिया है की तुम मेरी ओर से कोंट्रेक्ट पर हस्ताक्षर कर दोगे.मैं समझता हूँ की 5000 रुपये बहुत अच्छा पारिश्रमिक है.मेरी आशा से बहुत अधिक.जहाँ तक फिल्म के सिनेरियो के तैयार करने का प्रश्न है-मैं उस बारे में ज्यादा आशावादी नहीं हूँ.पहले तो अभी भारत लौटने की समस्या काफी उलझी हुई है-अस्पताल से कब रिहाई होगी, इस बारे में कुछ पक्का नहीं है.टिकट की समस्या अलग है.क्या उन्होंने तुम्हे बताया की फिल्म के लिए उन्होंने किन अभिनेताओं को चुनने का इरादा किया है-मिस्टर पुरोहित स्वयं कैसे व्यक्ति हैं-फिल्मों की समझ-बुझ कैसी है?

क्या तुमने बैलो की किताब Herzog पढ़ी है?यदि नहीं तो अवश्य पढ़ना.मुझे वह बहुत ही प्रभावपूर्ण लगी -या शायद जिस मनः स्थति में मैं हूँ उसमे उस किताब का असर सचमुच बहुत गहरा था किन्तु तुम्हे भी बहुत पसंद आएगी.इधर मैंने रसेल की आत्मकथा पढ़ी.बहुत ही साहसपूर्ण लेखन है और एक जिद और पैसन के साथ सत्य के लिए लड़ने की कोशिश.किन्तु जो चीज़ मुझे सबसे अधिक प्रभावित करने वाली लगी, वह है एक निर्मल और शाश्वत को छूने वाली  तटस्थता-कुछ वैसा ही जैसे War and Peace में आंद्रे युद्ध के मैदान में नीले आकाश को देख कर आसपास की मारकाट ,चीख-पुकारें, यहाँ तक की अपने घावों को भी भूल जाता है.

(एक अंग्रेजी में लिखा पत्र)

20.1.1968
If I get settled here in London and earn enough to go to see the theaters,exhibition etc, i would love to write a sort of Londn letter for the Times of India.But under the present circumstances, living on the margin as it were it dosent seem very promising.Writing these days comes hard to me.My mind most of the time is a little distracted for the things which lead to nothing or occupied.in things which demand immediate and radical solution and which most of the time I am shrinking to face.And yet-strange as it may sound my faith in ultimate validity of literature,(as a source of personal salvation) has been very much strengthened.May be it due to my personal disillusionment of Czech events.All along it has been a rather dismal year-and yet it had its own flashes of brightness without which my life would have been much poorer.

(1970 में निर्मल स्वदेश लौट आये.शुरू में यहाँ की परिस्थिति में अपनी गृहस्थी ज़माने की पड़ताल करने.समय के साथ साथ स्पष्ट होता गया है की उनके बौद्धिक जुड़ाव उन्हें भारत में बसने के लिए खींच रहे हैं.पहला विवाह टूटने का एक प्रमुख कारण यह था.
रामकुमार 1970 में बतौर रॉकफेलर फैलो सपरिवार अमेरिका प्रवास में थे.)




(भारत लौटने पर लिखे पत्रों के अंश)

मेरी कहानी माया दर्पण पर काम शुरू हो गया है.उसके निर्देशक कुमार साहनी हैं, जो दो साल पहले पेरिस में ब्रेसा के अधीन काम करके लौटे हैं.दूसरे लोगों से उनकी प्रतिभा के बारे में काफी सुनने को मिला.हाल में माया दर्पण के बारे में धर्मयुग में एक लेख भी निकला है, जिसमे शाहनी ने अपने प्रयोगों की चर्चा की है.क्या तुम् न्यू योर्क में कोई नयी भारतीय फिल्म देख  पाते हो?

तुम्हे ये जानकार गहरा दुःख होगा की बड़ी भाभीजी अब हमारे बीच नहीं रहीं, तीन दिन पहले शाम के समय उन्होंने आखिरी सांस ली.इन पंक्तियों को लिखते हुए भी इनपर विश्वास नहीं होता की यह सच है.सान्तवना केवल इस बात की है की उन्होंने बहुत शान्ति से अन्तिम घड़ी को झेला.पता नहीं क्यों, उनके शांतिपूर्ण अंत को देख कर स्वयं मृत्यु की भयावहता बहुत कम जान पड़ती थी.जैसे वह बहुत धीरज और संकल्प से एक सीढ़ी उतर कर दूसरी सीढ़ी पर चली गयी हों.

तुम्हे शायद अब विश्वास नहीं होगा की हम सब लोग अपनी दैनिक-दुनिया के धंधों में लौट आये हैं.केवल कभी कभी-सहसा खाली क्षणों में-एक झटके की तरह बड़ी भाभीजी का चेहरा सामने आ जाता है-और वह भी बहुत पुराना चेहरा, जब वह बीमार नहीं पड़ी थीं-और यह चीज़ सबसे अधिक आश्चर्यजनक लगती है की वह चेहरा अब चिरकाल तक देखने को नहीं मिलेगा-Can we do nothing about death? and for a long time the answer has been-Nothing! कैथरीन मेंसफिल्ड के इन शब्दों को सोच कर एक अन्तहिन हताशा-सी महसूस होने लगती है.

मैं बहुत शीघ्र इंग्लैण्ड जाने की सोच रहा था-क्यूंकि पुतुल बीमारी के बाद बहुत कमज़ोर हो गई है.किन्तु पिछले वर्षों में मेरे और बकुल के सम्बन्ध इतने शिथिल और अप्रीतिकर हो गए हैं, की वहाँ सिर्फ पुतुल के लगाव के अलावा मुझे जाने का कोई अर्थ समझ में नहीं आता.यह दयनीय स्थिति है.वह मुझे अक्सर याद करती है-मैं कुछ महीनो के लिए जाना भी चाहता हूँ-किन्तु फिर दुबारा उसे छोड़कर आना और भी असहनीय और भयंकर जान पड़ेगा.मेरे लिए किन्तु डर का एक अन्य कारण भी है.मेरे जाने के बाद माँजी अकेली रह  जायेंगी-अगर वो स्वस्थ होती तो मुझे इतनी चिंता न होती.तुम्हारा वाशिंगटन का ट्रिप कैसा रहा?यदि संभव हो सके तो जोन बायज और डिलेन थॉमस के रिकोर्ड और वाल्टर बेंजामिन की पुस्तक Illuminations खरीद लेना.वह एक बहुत महान मार्क्सवादी लेखक थ-कुछ वर्ष पहले उनकी मृत्यु हुई थी.Martin Buber की पुस्तक ‘I and Thou’ यदि मिल सके तो ले आना.

आज ही बीना के विवाह का कार्ड मिला.अब तक बार बार यह ख्याल आता था की मैं भय्ये को कुछ लिख सकूँ-फिर दिन बीतते गए.विवाह कैसा रहा?तुम लोग खासतौर से व्यस्त रहे होंगे.Strange-I was there at the time of pain and death, and now at this time-I feel lost! मुझे कभी कभी यह सोचकर काफी विस्मय होता है की सुख के लम्हे तक पहुँचते पहुँचते हम उन सब लोगों से जुदा हो जाते हैं, जिनके साथ हमने दुःख झेल कर ‘सुख’ का स्वप्न देखा था.

(जुलाई 1971 में निर्मल जी लन्दन में रह रहे थे और माँजी के मृत्यु का समाचार मिला.निर्मल जी के लिए यह बात बहुत दुःख की थी की उनकी मृत्यु के समय वे लन्दन में रहे जिसे वह जिंदगीभर भूल नहीं सके)

लगता है अब मैं धीरे धीरे उस आभाव का आदी हो चला हूँ जिसके बारे में कुछ दिन पहले तक सोचा भी न था.दैनिक-घटनाओं के अंतहीन चक्र में जैसे बीच का यह खोखलापन बिलकुल स्थिर और शांत हो,मैं रोज काम पर जाता हुआ, वापिस लौटता हुआ, उसे देखता भी नहीं-जैसे वहाँ कुछ भी घटा बढ़ा न हो.विदेश में यह भ्रम, इस तरह का भ्रम बहुत दिनों तक चल सकता है-लेकिन कभी कभी कोई पुरानी स्मृति, इस भ्रम को बिजली की तरह काट जाती है और तब सब कुछ टूट जाता है, अपने पर किसी तरह का संयम नहीं रहता-और तब मुझे यहाँ, इस जगह उनके न होने का दुःख भी असहनीय लगता है क्यूंकि मेरे लिए वह उस क्षण से नहीं थीं, जब से मैंने घर छोड़ा था, और मैं सही मायनों में उनके न होने की भयानकता को केवल उस क्षण पहचान पाऊंगा, जब दुबारा घर लौटूंगा.

वह हम सब के बीच महज कड़ी नहीं थीं, हमें एक-दूसरे को जोड़ने के लिए-वह उससे कहीं ज्यादा थीं,एक केंद्रीय बिंदु, जिनके आसपास हम सब अपने अपने माल-असबाब समेत घूमते थे, वह हमें जोड़ती नहीं थीं, उनके रहते हम खुद-ब-खुद एक दूसरे के साथ जुड़े रहते थे.इसीलिए तुम्हारा पत्र मिलने के बाद पहला अनुभव दुःख का उतना नहीं, जितना गहरे अकेलेपन का हुआ, जैसे किसी ने एक झटके से मुझे अकेले में, बिलकुल अलग धकेल दिया हो.शायद यह एक बहुत डरावने किस्म की पीड़ा है जब आदमी चुप रहने के बावजूद यह महसूस करता है-की जाने वाला व्यक्ति अपने साथ उन खास शब्दों को भी हमेशा के लिए अपने साथ ले गया है जो केवल उनके साथ रह कर बने थे..और जो खुद हमारे भीतर मर गए हैं या कुछ अरसे बाद मर जायेंगे.मैं कभी-कभी सोचता हूँ-की माँजी की स्मृति हमारे लिए कभी भी पुराने अर्थों में ‘स्मृति’ नहीं बन पाएगी-जैसे दूसरे व्यक्तियों की होती है.वह थीं-और आ नहीं हैं-इन दोनों के बीच अंतराल इतना गहरा जान पड़ता है की कोई भी स्मृति इन दो छोटों को नहीं पाट सकती.

बीच के इन दिनों में कभी कभी एक पगली सी इच्छा होती थी मैं एकदम वापिस घर लौट आऊं-जैसे महज घर लौट जाने से ही मैं कुछ कर सकूंगा, जैसे लौटने के Physical Act में ही मैं अपनी घबराहट से छुटकारा पा सकूंगा-जैसे महज अजनबी कमरे में बैठे-बैठे उन्हें याद करना असंभव हो, असह्य हो.लगता है, वह अब नहीं हैं-यह जैसे महज एक समाचार है, एक अफवाह-और सिर्फ मेरे लौटने पर वह मेरे लिए एक घटना बन सकेगी.वह अब कभी पुतुल को नहीं देखेंगी-यह ख्याल बार बार आता है.

(देश वापस आने पर निर्मल जी शिमला में रहे, रामकुमार उन दिनों रानीखेत में रहते थे)

तुम्हारा पत्र कुछ दिन पहले मिला था.यहाँ एक के बाद दूसरा दिन कुछ इतना चुपचाप गुजर जाता है, की पता नहीं चलता की कोई पत्र मिले कितना अर्सा गुजर चूका है और तब अचानक एक दिन समय बीतने का अहसास होने लगता है जैसे मुद्दत से रुकी कोई घड़ी खुद-ब-खुद चलने लगी हो.

लन्दन से एकदम लौटने के बाद मैं कुछ दिनों तक काफी उखड़ापन महसूस करता रहा.अब दिन-रात के असीम अंतहीन घेरे में सब कुछ ठहरा और शांत लगता है.कुछ काम भी शुरू किया है, जो दिन की रूटीन के साथ अपने में सही लगता है.यों भी पहाड़ों पर रह कर हर असाधारण चीज-दुःख या सुख-अपनी सही जगह संभाल लेटे हैं-जैसे हम नहीं, खुद पहाड हमारी जिंदगी का बोझ उठा लेटे हैं-उन्हें कोई बोझ नहीं पड़ता, हम खुद ही हल्के हो जाते हैं.

(कुछ दिन निर्मल जी बुदापेस्ट गए थे)

हम पिछले एक सप्ताह से यहाँ हैं.रूस के अठारह दिन अनेक शहरों में घूमते हुए बीते.मोस्को के अलावा लेनिनग्राद और कीव भी गए थे.किन्तु सबसे सुखद समय जोर्जिया में गुजरा-बहुत आत्मीय और स्नेही लोग मिले.वहाँ मौसम भी बहुत अच्छा था-मार्च में दिल्ली की तरह-वरना मॉस्को में तो लगभग दिन-रात बर्फ गिरती रहती थी.किन्तु हमारा अधिकांश समय म्युजिअम्स और कला-संग्रहालयों में ही घूमने में बीत जाता था.एक दिन हम यासना पोलयाना भी गए थे-टॉलस्टॉय का घर बर्फ से घिरा था; कब्र भी सफेदी में लिपटी थी.मॉस्को में चेखव का घर देखने भी गए थे.लेनिनग्राद अपने में बिलकुल अलग शहर जान पड़ा-नदी गलियों ने बीच नहरें, दोस्तोव्स्की का मकान.मुझे लगता था, उस शहर में मैं महीनों अकेला रह सकता हूँ.बीच में सिर्फ दो दिन ही रहे-ठिठुरती सर्दी और बर्फ में ही पुराने दिनों की स्मृति दबी है.एक अदभुत अनुभव था, जब हम एक मॉनेस्ट्री
में गए,जो नीचे अंडरग्राउंड में दबी है;वहाँ मध्यकाल में भिक्षुक रहते थे-और वहीँ मरते भी थे.तापमान इतना ठंडा था,की उनके मृत स्व शताब्दियों से ज्यों के त्यों साबुत रहते थे; अब भी वहाँ के तहखानों में कफ़न से ढंके उनके शव और कोटरों में हड्डियों के ढेर दिखाई देते हैं.

(निधन के तीन-चार महीने पहले लिखा एक खत; दो सप्ताह के लिए निर्मल जी बैंगलोर से 30 किलोमीटर दूर विवेकानंद योग संसथान में रहे थे.सांस की बीमारी के चलते यह स्थान उन्हें डॉ.अमृता भारती ने सुझाया था.)

यहाँ आये हुए लगभग पन्द्रह दिन हो गए -अब जाने की घड़ी भी निकट आ गयी है.परसों मैं बैंगलोर चला जाऊँगा, जो यहाँ इस योग आश्रम से तीन किलोमीटर की दुरी पर है.यहाँ वैसे भी अँधेरा होते ही आकाश तारों से घिर जाता है.कुछ कुछ रानीखेत के रात्रि-आकाश जैसा.चारों तरफ वीरानी है-दूर दूर तक कोई बस्ती,गाँव,आदमी,ढोर कुछ दिखाई नहीं देता-लंबी-पीली घास का विस्तार,पेड़ों के झुरमुट और ज़मीन से उठी हुई चट्टानें.शाम को सैर करने निकलता हूँ, तो हवा के सायं-सायं के अलावा कुछ भी सुनाई नहीं देता.सुबह साढ़े चार बजे उठाना पड़ता है-और जहाँ पांच बजे प्रार्थना और योग-क्रीड़ाओं के लिए अपनी टोर्च हाथ में लिए निकलता हूँ, तो आकाश में तारों का वही झुरमुट दिखाई देता है-जो पिछली रात दिखाई दिया था.यहाँ की नियमबद्ध जिंदगी बिलकुल नहीं अखरती.हर अभ्यास से पहले गीता या वेद के श्लोक गाये जाते हैं, ताकि मन-शारीर-आत्मा के बीच एक शांतिपूर्ण सामंजस्य हो सके.अलग-अलग बिमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए विशेष किस्म के अभ्यास सिखाए जाते हैं.इन कुछ दिनों में इन सब नियमों और पाबंदियों का कायल हो गया हूँ,जैसे हमेशा से मेरी ऐसी ही जीवन शैली रही है.मेरे लिए यह एक विचित्र अनुभव है.मनुष्य जरूरत पड़ने पर अपने को किसी भी जीवन ढाँचे में ढाल सकता है, न शराब की तलब लगती है, न सिगरेटों की…जैसे इनकी कभी हमारे दैनिक जीवन में कभी जरूरत ही नहीं रही हो..

आज शाम यहाँ पहली वर्षा हुई है-बाहर बिजली चमक रही है, और बादलों की गडगडआहट सुनते हुए पहली बार अजीब अकेलेपन की अनुभूति हो रही है.

बाकी बातें मिलने पर ही होंगी.

निर्मल

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  1. शायद मुझे इस पोस्ट को दो भागों में पोस्ट करना चाहिए था…

  2. लेखकीय मनस्थिति को समझने में बहुत ही उपयोगी हैं ये पत्र।

  3. अच्छा लगा पढना… इस श्रमसाध्य कार्य के लिए आपका आभार मित्र!

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