ज़िन्दगी और गुलाब – प्रेम गुप्ता मानी की कवितायें

मुझे भले अच्छी कवितायें लिखनी नहीं आती और नाही मुझे खुद की कवितायें ज्यादा पसंद कभी आई हैं…लेकिन कविताओं को पढ़ता खूब हूँ मैं, और सच कहूं तो मुझे कवितायें बहुत कम लोगों की प्रभावित करती हैं. ऐसे में आंटी(प्रेम गुप्ता ‘मानी’) को मैं वैसी कवियत्री की श्रेणी में रखता हूँ जिनकी लगभग सभी कवितायें मुझे पसंद आती हैं. अब उनकी कविताओं पर मैं ज्यादा क्या कहूं? मेरे पास सच में शब्द कम हैं. पिछले साल जब कानपुर गया था तो मुझे आंटी की तीन किताबें मिली थी, दो कहानी संग्रह और एक कविता संग्रह. वैसे तो इनकी कवितायें और कहानियां शुरू से पढ़ते आ रहा हूँ, कुछ ब्लॉग के माध्यम से और कुछ जो कभी कभी प्रियंका दीदी मुझे भेजती रहती थी पढ़ने को..हालांकि प्रियंका दीदी थोड़ी आलसी किस्म की दीदी है, कम ही कवितायें भेजी है उसने मुझे. मुझे लेकिन अब उतनी फ़िक्र नहीं है, आंटी की कवितायें अब मुझे ज्यादा आसानी से मिल जाया करेंगी क्यूंकि एक काम अच्छा किया है मेरी इस आलसी बहन ने. कल ही शाम मालूम चला कि प्रियंका दीदी ने आंटी की कविताओं के लिए एक फेसबुक पेज बना दिया है, तो अब उसमें तो ये कवितायें पोस्ट करते ही रहेंगी आंटी की, और आंटी चाहें तो खुद भी उसमें कवितायें पोस्ट कर सकती है, तो हमें आंटी की कवितायें आराम से पढ़ने को मिलती रहेंगी.आपको लग रहा होगा कि मैं यहाँ आंटी की कविताओं की अचानक से इतनी बातें क्यों करने लगा? दरअसल पिछले महीने लगभग दो तीन काव्य गोष्ठी में जाना हुआ था. और एक शाम इत्तेफाक ऐसा हुआ कि प्रियंका दीदी के जरिये ही मुझे आंटी की एक कविता पढ़ने को मिली, और उसके कुछ देर बाद ही मेरा गोष्ठी में जाना हुआ था. मुझे बार बार उस कविता गोष्ठी में ऐसा लग रहा था कि यहाँ एक भी कविता ऐसी नहीं सुनने को मिली जो उतनी प्रभावित कर सके जितनी आंटी की कवितायें करती हैं. उन्हें मैंने फ़ोन पर उसी दिन ये बात भी बताई. तब से सोच ही रहा था कि जल्द ही उनकी कोई कविता अपने ब्लॉग पर पोस्ट करूँगा. आंटी भी प्रियंका दीदी की तरह थोड़ी सी आलस दिखा देती हैं, अपने ब्लॉग को अपडेट करने में. उनके ब्लॉग का नाम है काथम. इन्हें ज्यादा लाइमलाइट में रहना पसंद भी नहीं उतना. लेकिन मैंने सोचा कि ये रहें न रहें लाइमलाइट में, इनकी कविताओं को तो लाइमलाइट में रहने का पूरा हक़ है न. तो बस इसलिए अपने इस ब्लॉग के माध्यम से उनकी कुछ कवितायें आप तक पहुंचा रहा हूँ.,

आजकल ब्लॉग और फेसबुक पर लगातार सिर्फ कवितायें पढ़ने को मिल रही हैं, इतनी कविताओं के बीच वैसी कवितायें कम ही होती हैं जो आपको प्रभावित करे. मैं अपनी बात करूं तो मुझे दो लोगों को कवितायें प्रभावित ज्यादा करती हैं, या कहिये कि उनकी कवितायेँ मुझे अच्छी लगती हैं. एक तो आंटी की, और दूसरी गिरिजा जी(गिरिजा कुलश्रेष्ठ) की कवितायें और कहानियां. यहाँ गिरिजा जी का जिक्र मैंने इसलिए किया कि जाने क्यों मुझे दोनों की कविता पढ़ने के बाद एक सा ही एहसास होता है, ये मेरा भ्रम है या क्या पता नहीं. लेकिन इस बार मैंने आंटी से गिरिजा जी का भी जिक्र किया और यही बात उन्हें मैंने बताई भी थी. आंटी को गिरिजा जी की कविताओं के कुछ अंश मैंने पढ़ के सुनाया भी था. उन्हें भी शायद उनकी कवितायें उतनी ही अच्छी लगी होंगी जितनी मुझे. खैर, बातें अब खत्म करता हूँ और आंटी की कुछ क्षणिकाएं यहाँ पोस्ट करता हूँ. आंटी की अधिकतर कवितायें लम्बी सी है, उन्हें आप पढ़ना चाहें तो इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं.  बाकी अभी कुछ अच्छी कविताओं के मजे लीजिये.

१.
जब जब
मैंने ज़िन्दगी से
रौशनी की तलाश की
अँधेरा सामने आकर
रौंद गया मेरे सपनों को
पर अब
जब मैंने
अंधेरों को स्वीकार लिया है
रौशनी
खुद मेरी तलाश में है

२.
ज़िन्दगी और गुलाब

दोनो ही
खिलकर महकाते हैं
अपनी-अपनी बगिया को
और दोनो ही
जीने की कला सिखाते हैं
काँटों से भी बिंधकर
कैसे मुस्कराया जाता है
ज़िन्दगी और गुलाब
जाने से पहले
वक़्त की चौखट
इसी फ़िज़ा को छोड जाते हैं…

३.
हम

दूसरों के पाँवों से चलकर
तय करना चाहते हैं
मीलों लम्बा सफ़र
पर,
थक जाते हैं जब वे पाँव
तब अलग कर देते हैं उन्हें
झटक देते हैं अपने से दूर
और फिर जुट जाते हैं
नए सिरे से
एक जोडी और
पाँवों की तलाश में…|४.
रुको राम

सीता को वनवास देने से पहले
सोचो कि-
धोबी के कलंक से बचने का
तुम्हारा यह तरीका
क्या तुम्हें फिर कलंकित न करेगा…?५.
रात की फ़टी चादर से

जर्जर तन को लपेटे
 एक गुमनाम अन्धेरे ने
कमरे के रोशनदान से
झाँक कर
रोशनी से कहा
ख़ुदगर्ज़
एक बार बाहर आकर

मुझसे रू-ब-रू तो हो ।६.

उम्मीद का दामन थाम कर
नन्हीं ने पार की
मुश्किलों की नदी
पर,
दूसरे किनारे
मगरमच्छों का डेरा था…।

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  1. प्रिय अभिषेक , प्रेम जी की कविताएँ पढ़कर सचमुच लगता है की यह मैंने क्यों नहीं लिखी विचार तो मेरा भी ऐसा ही कुछ था . यही है अच्छी रचना की पहचान . इन्हें पाठकों ( जो प्रेमजी से परिचित नहीं हैं ) तक पहुंचा कर आपने अपनी भाव-प्रवणता गुणग्राह्यता का परिचय और भी अच्छी तरह दिया है . जहां तक मेरे जिक्र का सवाल है , मैं आप जैसे पाठकों के कारण ही खुद को रचनाकार मानने लगी हूँ . इस आत्मीयता का कोई उत्तर नहीं है .

  2. बहुत अच्छे से लिखा है रे तुमने माँ की कविताओं के बारे में…बाकी क्या कहें…:-D

  3. अचानक किसी प्लीजेंट सरप्राइज की तरह सामने आई इस ब्लॉग पोस्ट से थोड़ी अचंभित भी हुई और बहुत ख़ुशी भी हुई । बहुत अच्छा लगा पढ़ के…। तुम्हारी पोस्ट्स बीच बीच में पढ़ती रहती हूँ और तुम्हारी लेखन प्रतिभा की कायल भी हूँ…। इस लिए इससे मेरा इत्तेफाक नहीं कि तुम अच्छी कविताएँ नहीं लिखते ।

    गिरिजा जी की इस खूबसूरत प्रतिक्रिया के लिए उनका आभार…।

    तुम मेरे बच्चे हो, इस लिए देना तो चाहती थी, पर शुक्रिया दूँगी नहीं…।

    खुश रहो…खूब लिखो…और लोकप्रियता के शिखर को छुओ…।

  4. टुकड़ों टुकड़ों में पढता रहा हूँ इनको. फेसबुक पर बच्चों के माध्यम से. और उनकी कविताओं को मन ही मन सराहता भी रहा हूँ. कविता तो मेरे बस की चीज़ भी नहीं, लेकिन अच्छी और बुरी कविता की पहचान तो कर ही लेता हूँ. कल जब गिरिजा दीदी ने मुझसे तारीफ की तो मुझे लगा कि चलो मेरी पसन्द पर तस्दीक की एक मुहर लग गयी!
    बच्चों के लिये यह सब एक सीखने के जैसा है. और हम जैसे पढने वालों के लिये आनन्द का अवसर.
    मेरी ओर से इस पोस्ट की बधाई!! हमेशा की तरह दिल से!

  5. बहुत अच्छी कवितायें हैं । सरल अभिव्यक्ति पर जीवन से जुड़ा गहन सार लिए

    शुभकामनायें

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