कविता: शाम बेच दी है – केदारनाथ सिंह

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हमनें न जाने क्या क्या खोया है, इस आधुनिकता की चकाचौंध में. कुछ पाने के लिए कितना कुछ खोना पड़ा. वो शामें जो कभी हमारे पास थी, हमनें उसे खो दिया और किस कदर खोया है, ये आप केदारनाथ सिंह के इस कविता के जरिये समझ सकते हैं. शायद हमारे आयर आपके, हर किसी की मन की बात है ये.

कविता: शाम बेच दी है - केदारनाथ सिंह

शाम बेच दी है
भाई, शाम बेच दी है
मैंने शाम बेच दी है!

वो मिट्टी के दिन, वो धरौंदों की शाम,
वो तन-मन में बिजली की कौंधों की शाम,
मदरसों की छुट्टी, वो छंदों की शाम,
वो घर भर में गोरस की गंधों की शाम
वो दिनभर का पढना, वो भूलों की शाम,
वो वन-वन के बांसों-बबूलों की शाम,
झिडकियां पिता की, वो डांटों की शाम,
वो बंसी, वो डोंगी, वो घाटों की शाम,
वो बांहों में नील आसमानों की शाम,
वो वक्ष तोड-तोड उठे गानों की शाम,
वो लुकना, वो छिपना, वो चोरी की शाम,
वो ढेरों दुआएं, वो लोरी की शाम,
वो बरगद पे बादल की पांतों की शाम
वो चौखट, वो चूल्हे से बातों की शाम,
वो पहलू में किस्सों की थापों की शाम,
वो सपनों के घोडे, वो टापों की शाम,

वो नए-नए सपनों की शाम बेच दी है,
भाई, शाम बेच दी है, मैंने शाम बेच दी है।

वो सडकों की शाम, बयाबानों की शाम,
वो टूटे रहे जीवन के मानों की शाम,
वो गुम्बद की ओट हुई झेपों की शाम,
हाट-बाटों की शाम, थकी खेपों की शाम,
तपी सांसों की तेज रक्तवाहों की शाम,
वो दुराहों-तिराहों-चौराहों की शाम,
भूख प्यासों की शाम, रुंधे कंठों की शाम,
लाख झंझट की शाम, लाख टंटों की शाम,
याद आने की शाम, भूल जाने की शाम,
वो जा-जा कर लौट-लौट आने की शाम,
वो चेहरे पर उडते से भावों की शाम,
वो नस-नस में बढते तनावों की शाम,
वो कैफे के टेबल, वो प्यालों की शाम,
वो जेबों पर सिकुडन के तालों की शाम,
वो माथे पर सदियों के बोझों की शाम
वो भीडों में धडकन की खोजों की शाम,

वो तेज-तेज कदमों की शाम बेच दी है,
भाई, शाम बेच दी है, मैंने शाम बेच दी है।

Meri Baateinhttp://meribaatein.in
Meribatein is a personal blog. Read nostalgic stories and memoir of 90's decade. Articles, stories, Book Review and Cinema Reviews and Cinema Facts.

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